अध्याय 15 · 19 / 19
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इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
iti—इस प्रकार; guhyatamam—परम गोपनीय; śāstram—प्रकट शास्त्र; idam—यह; uktam—प्रकट किया गया; mayā—मेरे द्वारा; anagha—हे निष्पाप; etat—यह; buddhvā—समझकर; buddhimān—बुद्धिमान्; syāt—हो जाता है; kṛta-kṛtyaḥ—परम सिद्ध; ca—और; bhārata—हे भरतपुत्र।
हे निष्पाप, यह वैदिक शास्त्रों का परम गोपनीय अंश है, और अब मैंने इसे प्रकट किया है। जो कोई इसे समझ लेगा, वह बुद्धिमान् हो जाएगा, और उसके प्रयास सिद्धि को प्राप्त करेंगे।
भगवान् यहाँ स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि यह समस्त प्रकट शास्त्रों का सार है। और मनुष्य को इसे उसी रूप में समझना चाहिए, जैसा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इसे दिया है। इस प्रकार मनुष्य दिव्य ज्ञान में बुद्धिमान् तथा सिद्ध हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इस दर्शन को समझकर तथा उनकी दिव्य सेवा में संलग्न होकर प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के समस्त कल्मष से मुक्त हो सकता है। भक्ति आध्यात्मिक बोध की एक प्रक्रिया है। जहाँ भी भक्ति विद्यमान रहती है, वहाँ भौतिक कल्मष साथ नहीं रह सकता। भगवान् की भक्ति तथा स्वयं भगवान् एक ही हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक हैं—परमेश्वर की अन्तरंगा शक्ति। भगवान् को सूर्य कहा गया है, और अज्ञान को अन्धकार कहा गया है। जहाँ सूर्य उपस्थित है, वहाँ अन्धकार का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः जहाँ भी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समुचित मार्गदर्शन में भक्ति विद्यमान है, वहाँ अज्ञान का प्रश्न ही नहीं उठता।
प्रत्येक व्यक्ति को इस कृष्णभावनामृत को ग्रहण करना चाहिए और भक्ति में संलग्न होकर बुद्धिमान् तथा शुद्ध बनना चाहिए। जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण को समझने की इस स्थिति पर नहीं पहुँचता और भक्ति में संलग्न नहीं होता, तब तक वह किसी साधारण व्यक्ति की दृष्टि में चाहे जितना भी बुद्धिमान् क्यों न हो, पूर्ण रूप से बुद्धिमान् नहीं है।
anagha शब्द, जिससे अर्जुन को सम्बोधित किया गया है, सार्थक है। anagha, अर्थात् हे निष्पाप, का अर्थ यह है कि जब तक मनुष्य समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं होता, तब तक श्रीकृष्ण को समझ पाना अत्यन्त कठिन है। मनुष्य को समस्त कल्मष, समस्त पापमय कर्मों से मुक्त होना पड़ता है; तभी वह समझ सकता है। किन्तु भक्ति इतनी शुद्ध तथा सामर्थ्यवान् है कि एक बार भक्ति में संलग्न होने पर मनुष्य स्वतः ही निष्पापता की अवस्था को प्राप्त हो जाता है।
पूर्ण कृष्णभावनामृत में शुद्ध भक्तों की संगति में भक्ति करते समय कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें पूर्णतया जीतना आवश्यक है। सबसे प्रमुख बात जिसे मनुष्य को पार करना है, वह है हृदय की दुर्बलता। प्रथम पतन भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा के कारण होता है। इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर की दिव्य प्रेममयी सेवा का त्याग कर देता है। हृदय की दूसरी दुर्बलता यह है कि ज्यों-ज्यों मनुष्य भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है, त्यों-त्यों वह पदार्थ तथा पदार्थ के स्वामित्व के प्रति आसक्त होता जाता है। भौतिक अस्तित्व की समस्याएँ हृदय की इन्हीं दुर्बलताओं के कारण हैं।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय “पुरुषोत्तम-योग, परम पुरुष का योग” पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।