हि

अध्याय 16 · 1 / 19

16.1-3

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; अभयम्—निर्भयता; सत्त्व-संशुद्धिः—अपने अस्तित्व का शुद्धिकरण; ज्ञान—ज्ञान; योग—संयोग का; व्यवस्थितिः—स्थिति; दानम्—दान; दमः च—तथा मन का संयम; यज्ञः च—तथा यज्ञ का सम्पादन; स्वाध्यायः—वैदिक साहित्य का अध्ययन; तपः—तपस्या; आर्जवम्—सरलता; अहिंसा—अहिंसा; सत्यम्—सत्यता; अक्रोधः—क्रोध से मुक्ति; त्यागः—त्याग; शान्तिः—शान्ति; अपैशुनम्—दोष-दर्शन से विमुखता; दया—दया; भूतेषु—समस्त जीवों के प्रति; अलोलुप्त्वम्—लोभ से मुक्ति; मार्दवम्—मृदुता; ह्रीः—विनम्रता; अचापलम्—संकल्प; तेजः—ओज; क्षमा—क्षमा; धृतिः—धैर्य; शौचम्—शुचिता; अद्रोहः—ईर्ष्या से मुक्ति; न—नहीं; अतिमानिता—मान की अपेक्षा; भवन्ति—होते हैं; सम्पदम्—गुण; दैवीम्—दिव्य; अभिजातस्य—जिसने जन्म लिया है; भारत—हे भरतपुत्र।

श्रीभगवान् ने कहा : निर्भयता, अपने अस्तित्व का शुद्धिकरण, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्मसंयम, यज्ञ का सम्पादन, वेदों का अध्ययन, तपस्या तथा सरलता; अहिंसा, सत्यता, क्रोध से मुक्ति; त्याग, शान्ति, दोष-दर्शन से विमुखता, करुणा तथा लोभ से मुक्ति; मृदुता, विनम्रता तथा अटल संकल्प; ओज, क्षमा, धैर्य, शुचिता, ईर्ष्या से मुक्ति तथा मान की लालसा का अभाव—हे भरतपुत्र! ये दिव्य गुण दैवी प्रकृति से सम्पन्न देवतुल्य मनुष्यों में होते हैं।

पन्द्रहवें अध्याय के आरम्भ में इस भौतिक जगत् रूपी वटवृक्ष की व्याख्या की गई थी। उससे निकलने वाली अतिरिक्त जड़ों की तुलना जीवों के कर्मों से की गई थी, जिनमें कुछ शुभ और कुछ अशुभ थे। नवें अध्याय में भी देवताओं अथवा देवतुल्य जनों, तथा असुरों अथवा अधर्मी जनों अर्थात् राक्षसों की विवेचना की गई थी। अब, वैदिक विधानों के अनुसार सत्त्वगुण में किए गए कर्म मोक्ष-मार्ग पर प्रगति के लिए शुभ माने जाते हैं, और ऐसे कर्म देव-प्रकृति अर्थात् स्वभावतः दिव्य कहलाते हैं। जो दिव्य प्रकृति में स्थित हैं, वे मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर होते हैं। दूसरी ओर, जो रजोगुण तथा तमोगुण में कर्म करते हैं, उनके लिए मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं। या तो उन्हें इस भौतिक जगत् में मनुष्य रूप में रहना पड़ेगा, या वे पशु-योनियों अथवा उससे भी निम्न जीवन-रूपों में उतर जाएँगे। इस सोलहवें अध्याय में भगवान् दिव्य प्रकृति तथा उसके सहवर्ती गुणों, एवं आसुरी प्रकृति तथा उसके गुणों—दोनों की व्याख्या करते हैं। साथ ही वे इन गुणों के लाभ तथा हानि को भी समझाते हैं।

दिव्य गुणों अथवा देवतुल्य प्रवृत्तियों से जन्म लेने वाले के सन्दर्भ में अभिजातस्य शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। देवतुल्य वातावरण में सन्तान उत्पन्न करना वैदिक शास्त्रों में गर्भाधान-संस्कार कहलाता है। यदि माता-पिता देवतुल्य गुणों से युक्त सन्तान चाहते हैं, तो उन्हें मनुष्य के दस सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए। भगवद्गीता में हम पहले भी पढ़ चुके हैं कि उत्तम सन्तान उत्पन्न करने हेतु यौन-जीवन स्वयं श्रीकृष्ण हैं। यौन-जीवन निन्द्य नहीं है, बशर्ते यह प्रक्रिया कृष्णभावनामृत में प्रयुक्त हो। जो कृष्णभावनामृत में हैं, उन्हें कम-से-कम बिल्लियों-कुत्तों के समान सन्तान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए, अपितु ऐसी सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए जो जन्म के पश्चात् कृष्णभावनाभावित बन सके। कृष्णभावनामृत में लीन पिता अथवा माता से उत्पन्न सन्तान का यही लाभ होना चाहिए।

वर्णाश्रम-धर्म नामक सामाजिक संस्था—जो समाज को चार वर्गों अथवा वर्णों में विभाजित करती है—मनुष्य-समाज को जन्म के आधार पर विभाजित करने के लिए नहीं है। ऐसे विभाजन शैक्षिक योग्यताओं के अनुसार हैं। वे समाज को शान्ति तथा समृद्धि की स्थिति में रखने हेतु हैं। यहाँ वर्णित गुणों की व्याख्या दिव्य गुणों के रूप में की गई है, जिनका प्रयोजन मनुष्य को आध्यात्मिक बोध में प्रगति कराना है, ताकि वह भौतिक जगत् से मुक्त हो सके। वर्णाश्रम संस्था में संन्यासी अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति समस्त सामाजिक स्तरों तथा आश्रमों का प्रमुख अथवा आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। ब्राह्मण समाज के अन्य तीन वर्गों अर्थात् क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों का आध्यात्मिक गुरु माना जाता है, किन्तु संन्यासी, जो इस संस्था के शिखर पर है, ब्राह्मणों का भी आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। संन्यासी के लिए प्रथम योग्यता निर्भयता होनी चाहिए। चूँकि संन्यासी को बिना किसी सहारे या सहारे के आश्वासन के अकेले रहना होता है, अतः उसे केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि वह सोचता है, “अपने सम्बन्धों को त्याग देने के पश्चात् मेरी रक्षा कौन करेगा?” तो उसे संन्यास आश्रम स्वीकार नहीं करना चाहिए। मनुष्य को पूर्णतः विश्वस्त होना चाहिए कि श्रीकृष्ण अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने स्थानिक अंश परमात्मा के रूप में सदा भीतर विद्यमान हैं, कि वे सब कुछ देख रहे हैं और सदा जानते हैं कि मनुष्य क्या करने का अभिप्राय रखता है। अतः मनुष्य को यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि श्रीकृष्ण परमात्मा रूप में अपने शरणागत जीव की देखभाल करेंगे। मनुष्य को सोचना चाहिए, “मैं कभी अकेला नहीं रहूँगा। चाहे मैं किसी वन के सघनतम अन्धकारमय प्रदेश में रहूँ, श्रीकृष्ण मेरे साथ रहेंगे, और वे मुझे पूर्ण संरक्षण देंगे।” यही विश्वास अभयम् अर्थात् निर्भयता कहलाता है। संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति के लिए यह मनःस्थिति आवश्यक है। तत्पश्चात् उसे अपने अस्तित्व को शुद्ध करना होता है। संन्यास आश्रम में पालन करने योग्य अनेक नियम तथा विधान हैं। इन सबमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि संन्यासी को स्त्री से किसी भी प्रकार का घनिष्ठ सम्बन्ध रखना कठोरता से वर्जित है। उसे एकान्त स्थान में स्त्री से बात करना तक वर्जित है। भगवान् चैतन्य आदर्श संन्यासी थे, और जब वे पुरी में थे तब उनकी स्त्री-भक्तजन प्रणाम अर्पित करने हेतु उनके समीप तक नहीं आ सकती थीं। उन्हें दूर से ही प्रणाम करने का परामर्श दिया जाता था। यह स्त्री-वर्ग के प्रति घृणा का चिह्न नहीं है, अपितु संन्यासी पर लगाया गया यह बन्धन है कि वह स्त्रियों से घनिष्ठ सम्बन्ध न रखे। अपने अस्तित्व को शुद्ध करने हेतु मनुष्य को जीवन की किसी विशिष्ट स्थिति के नियमों तथा विधानों का पालन करना होता है। संन्यासी के लिए स्त्रियों से घनिष्ठ सम्बन्ध तथा इन्द्रियतृप्ति हेतु धन-संग्रह कठोरता से वर्जित हैं। आदर्श संन्यासी स्वयं भगवान् चैतन्य थे, और हम उनके जीवन से सीख सकते हैं कि वे स्त्रियों के विषय में अत्यन्त कठोर थे। यद्यपि वे भगवान् के सर्वाधिक उदार अवतार माने जाते हैं, जो अत्यन्त पतित बद्धजीवों को भी स्वीकार करते हैं, फिर भी उन्होंने स्त्री-संग के विषय में संन्यास आश्रम के नियमों तथा विधानों का कठोरता से पालन किया। उनके एक घनिष्ठ पार्षद, अर्थात् छोटा हरिदास, अपने अन्य अन्तरंग पार्षदों के साथ भगवान् चैतन्य के साथ व्यक्तिगत रूप से सम्बद्ध थे, किन्तु किसी कारण इस छोटा हरिदास ने एक युवती को कामभाव से देखा, और भगवान् चैतन्य इतने कठोर थे कि उन्होंने तत्क्षण उसे अपने पार्षदों के समाज से निष्कासित कर दिया। भगवान् चैतन्य ने कहा, “संन्यासी के लिए, अथवा किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो भौतिक प्रकृति के बन्धन से बाहर निकलने की आकांक्षा रखता है तथा स्वयं को आध्यात्मिक प्रकृति तक उठाकर भगवद्धाम लौटने का प्रयत्न कर रहा है—उसके लिए इन्द्रियतृप्ति हेतु भौतिक सम्पत्तियों तथा स्त्रियों की ओर देखना—उनका भोग करना तो दूर, मात्र ऐसी प्रवृत्ति से उनकी ओर देखना—इतना निन्द्य है कि ऐसी अवैध इच्छाओं का अनुभव करने से पूर्व उसके लिए आत्मघात कर लेना श्रेयस्कर है।” अतः ये शुद्धिकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

अगला तत्त्व है ज्ञान-योग-व्यवस्थितिः अर्थात् ज्ञान के अनुशीलन में संलग्न होना। संन्यासी जीवन का प्रयोजन उन गृहस्थों तथा अन्य जनों को ज्ञान वितरित करना है, जो आध्यात्मिक उन्नति के अपने वास्तविक जीवन को भूल चुके हैं। संन्यासी को अपनी जीविका हेतु द्वार-द्वार माँगना होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह भिखारी है। विनम्रता भी दिव्य रूप से स्थित व्यक्ति की एक योग्यता है, और परम विनम्रता के कारण ही संन्यासी द्वार-द्वार जाता है—ठीक भिक्षा के प्रयोजन से नहीं, अपितु गृहस्थों को देखने तथा उन्हें कृष्णभावनामृत के प्रति जाग्रत करने हेतु। यही संन्यासी का कर्तव्य है। यदि वह वस्तुतः उन्नत है और उसके आध्यात्मिक गुरु द्वारा ऐसा आदेश दिया गया है, तो उसे तर्क तथा बोध सहित श्रीकृष्ण का प्रचार करना चाहिए, और यदि वह इतना उन्नत नहीं है, तो उसे संन्यास आश्रम स्वीकार नहीं करना चाहिए। किन्तु यदि उसने पर्याप्त ज्ञान के बिना भी संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, तो उसे ज्ञान के अनुशीलन हेतु किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से श्रवण करने में पूर्णतः संलग्न होना चाहिए। संन्यासी अथवा संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति को निर्भयता, सत्त्व-संशुद्धिः (शुचिता) तथा ज्ञान-योग (ज्ञान) में स्थित होना चाहिए।

अगला तत्त्व है दान। दान का प्रयोजन गृहस्थों के लिए है। गृहस्थों को सम्माननीय साधनों से जीविका अर्जित करनी चाहिए तथा अपनी आय का पचास प्रतिशत समस्त संसार में कृष्णभावनामृत के प्रचार हेतु व्यय करना चाहिए। अतः गृहस्थ को ऐसी सांस्थानिक संस्थाओं को दान देना चाहिए जो इस रीति से संलग्न हैं। दान उचित पात्र को दिया जाना चाहिए। दान के विभिन्न प्रकार हैं, जैसा आगे समझाया जाएगा—सत्त्व, रज तथा तमोगुण में दान। शास्त्रों द्वारा सत्त्वगुण में दान की अनुशंसा की जाती है, किन्तु रज तथा तमोगुण में दान की अनुशंसा नहीं की जाती, क्योंकि वह केवल धन का अपव्यय है। दान केवल समस्त संसार में कृष्णभावनामृत के प्रचार हेतु दिया जाना चाहिए। यही सत्त्वगुण में दान है।

तत्पश्चात् जहाँ तक दमः (आत्मसंयम) का सम्बन्ध है, यह केवल धार्मिक समाज के अन्य आश्रमों के लिए ही नहीं, अपितु विशेष रूप से गृहस्थ के लिए है। यद्यपि गृहस्थ की पत्नी होती है, फिर भी उसे यौन-जीवन के लिए अपनी इन्द्रियों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए। गृहस्थों के लिए यौन-जीवन में भी प्रतिबन्ध हैं, जिसमें केवल सन्तानोत्पत्ति हेतु ही प्रवृत्त होना चाहिए। यदि उसे सन्तान की आवश्यकता नहीं, तो उसे अपनी पत्नी के साथ यौन-जीवन का भोग नहीं करना चाहिए। आधुनिक समाज सन्तान के उत्तरदायित्व से बचने हेतु गर्भनिरोधक उपायों अथवा उससे भी अधिक निन्द्य उपायों के साथ यौन-जीवन का भोग करता है। यह दिव्य गुण में नहीं, अपितु आसुरी है। यदि कोई, चाहे वह गृहस्थ ही क्यों न हो, आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे अपने यौन-जीवन का संयम करना चाहिए और श्रीकृष्ण की सेवा के प्रयोजन के बिना सन्तान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। यदि वह ऐसी सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ है जो कृष्णभावनामृत में रहेंगी, तो मनुष्य सैकड़ों सन्तान उत्पन्न कर सकता है, किन्तु इस सामर्थ्य के बिना उसे केवल इन्द्रिय-सुख हेतु लिप्त नहीं होना चाहिए।

यज्ञ गृहस्थों द्वारा सम्पादित किया जाने वाला एक अन्य तत्त्व है, क्योंकि यज्ञों के लिए विपुल धन की आवश्यकता होती है। अन्य आश्रमों, अर्थात् ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास के पास धन नहीं होता; वे भिक्षा से जीवन-निर्वाह करते हैं। अतः विभिन्न प्रकार के यज्ञों का सम्पादन गृहस्थ के लिए है। उन्हें वैदिक साहित्य में निर्दिष्ट अग्नि-होत्र यज्ञ सम्पन्न करने चाहिए, किन्तु ऐसे यज्ञ वर्तमान समय में अत्यन्त व्ययसाध्य हैं, और किसी भी गृहस्थ के लिए उन्हें सम्पन्न करना सम्भव नहीं। इस युग में अनुशंसित सर्वश्रेष्ठ यज्ञ संकीर्तन-यज्ञ कहलाता है—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप। यह सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वाधिक अल्प-व्यय वाला यज्ञ है; प्रत्येक जन इसे अपना सकता है और लाभ प्राप्त कर सकता है। अतः ये तीन तत्त्व, अर्थात् दान, इन्द्रिय-संयम तथा यज्ञ का सम्पादन, गृहस्थ के लिए हैं।

तत्पश्चात् स्वाध्यायः अर्थात् वैदिक अध्ययन, तथा तपस् अर्थात् तपस्या, तथा आर्जवम् अर्थात् मृदुता या सरलता—ये ब्रह्मचर्य अथवा विद्यार्थी-जीवन के लिए हैं। ब्रह्मचारियों का स्त्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए; उन्हें ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन हेतु मन को वैदिक साहित्य के अध्ययन में संलग्न करना चाहिए। यही स्वाध्यायः कहलाता है। तपस् अथवा तपस्या विशेष रूप से वानप्रस्थ जीवन के लिए है। मनुष्य को आजीवन गृहस्थ नहीं बने रहना चाहिए; उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि जीवन के चार आश्रम हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। अतः गृहस्थ अर्थात् गार्हस्थ्य जीवन के पश्चात् मनुष्य को विरत हो जाना चाहिए। यदि कोई सौ वर्ष जीवित रहता है, तो उसे पच्चीस वर्ष विद्यार्थी-जीवन में, पच्चीस गृहस्थ जीवन में, पच्चीस वानप्रस्थ जीवन में तथा पच्चीस संन्यास आश्रम में व्यतीत करने चाहिए। ये वैदिक धार्मिक अनुशासन के विधान हैं। गार्हस्थ्य जीवन से विरत मनुष्य को शरीर, मन तथा वाणी की तपस्याओं का अभ्यास करना चाहिए। यही तपस्या है। समस्त वर्णाश्रम-धर्म समाज तपस्या के लिए है। तपस्या के बिना कोई भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यह मत कि जीवन में तपस्या की कोई आवश्यकता नहीं, कि मनुष्य कल्पना करता रहे और सब कुछ ठीक हो जाएगा—न वैदिक साहित्य में अनुशंसित है और न भगवद्गीता में। ऐसे मत प्रदर्शनप्रिय आध्यात्मिकतावादियों द्वारा गढ़े जाते हैं, जो अधिकाधिक अनुयायी एकत्र करने का प्रयत्न करते हैं। यदि प्रतिबन्ध, नियम तथा विधान हों, तो लोग आकृष्ट नहीं होंगे। अतएव जो धर्म के नाम पर केवल प्रदर्शन हेतु अनुयायी चाहते हैं, वे न अपने शिष्यों के जीवन को प्रतिबन्धित करते हैं और न अपने जीवन को। किन्तु वह विधि वेदों द्वारा अनुमोदित नहीं है।

जहाँ तक सरलता का सम्बन्ध है, इस सिद्धान्त का पालन केवल किसी विशिष्ट आश्रम को ही नहीं, अपितु प्रत्येक सदस्य को करना चाहिए, चाहे वह ब्रह्मचर्य-आश्रम में हो, या गृहस्थ-आश्रम में या वानप्रस्थ-आश्रम में। मनुष्य को अत्यन्त सरलता से जीवन व्यतीत करना चाहिए।

अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव के प्रगतिशील जीवन को न रोकना। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि शरीर के मारे जाने के पश्चात् भी आत्मा-स्फुलिंग कभी नहीं मारी जाती, अतः इन्द्रियतृप्ति हेतु पशुओं को मारने में कोई हानि नहीं। लोग अब प्रचुर मात्रा में अन्न, फल तथा दुग्ध की उपलब्धता के होते हुए भी पशु खाने के व्यसनी हो गए हैं। पशु-वध की कोई आवश्यकता नहीं। यह विधान प्रत्येक जन के लिए है। जब कोई अन्य विकल्प न हो, तो मनुष्य किसी पशु को मार सकता है, किन्तु उसे यज्ञ में अर्पित किया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार, जब मानवता के लिए प्रचुर खाद्य-आपूर्ति हो, तो आध्यात्मिक बोध में प्रगति की कामना करने वाले व्यक्तियों को पशुओं पर हिंसा नहीं करनी चाहिए। वास्तविक अहिंसा का अर्थ है किसी के प्रगतिशील जीवन को न रोकना। पशु भी एक पशु-योनि से दूसरी में संक्रमण करते हुए अपने विकासात्मक जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि किसी विशिष्ट पशु को मार दिया जाए, तो उसकी प्रगति रुक जाती है। यदि कोई पशु किसी विशिष्ट शरीर में इतने दिनों या इतने वर्षों तक रहने वाला है और असमय मार दिया जाता है, तो उसे अन्य जीवन-योनि में पदोन्नत होने हेतु शेष दिनों को पूर्ण करने के लिए पुनः उसी जीवन-रूप में आना पड़ता है। अतः मात्र अपने स्वाद को तृप्त करने हेतु उनकी प्रगति को नहीं रोकना चाहिए। यही अहिंसा कहलाती है।

सत्यम्। इस शब्द का अर्थ है कि मनुष्य को किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सत्य को विकृत नहीं करना चाहिए। वैदिक साहित्य में कुछ कठिन अंश हैं, किन्तु उनका अर्थ अथवा प्रयोजन किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सीखना चाहिए। वेदों को समझने की यही प्रक्रिया है। श्रुति का अर्थ है कि मनुष्य को अधिकारी से श्रवण करना चाहिए। मनुष्य को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु कोई व्याख्या नहीं गढ़नी चाहिए। भगवद्गीता पर इतनी टीकाएँ हैं जो मूल पाठ की भ्रामक व्याख्या करती हैं। शब्द का वास्तविक तात्पर्य प्रस्तुत किया जाना चाहिए, और वह किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सीखना चाहिए।

अक्रोधः का अर्थ है क्रोध का संयम करना। यदि उत्तेजना भी हो, तो मनुष्य को सहनशील रहना चाहिए, क्योंकि एक बार क्रुद्ध हो जाने पर उसका समूचा शरीर दूषित हो जाता है। क्रोध रजोगुण तथा काम का उत्पाद है, अतः जो दिव्य रूप से स्थित है, उसे स्वयं को क्रोध से रोकना चाहिए। अपैशुनम् का अर्थ है कि मनुष्य को दूसरों में दोष नहीं खोजना चाहिए या उन्हें अनावश्यक रूप से शुद्ध नहीं करना चाहिए। निस्सन्देह चोर को चोर कहना दोष-दर्शन नहीं है, किन्तु किसी ईमानदार व्यक्ति को चोर कहना आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने वाले के लिए अत्यन्त अपराधपूर्ण है। ह्रीः का अर्थ है कि मनुष्य को अत्यन्त विनम्र होना चाहिए तथा कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो निन्द्य हो। अचापलम् अर्थात् संकल्प का अर्थ है कि मनुष्य को किसी प्रयास में विचलित अथवा हताश नहीं होना चाहिए। किसी प्रयास में विफलता हो सकती है, किन्तु मनुष्य को उसके लिए खिन्न नहीं होना चाहिए; उसे धैर्य तथा संकल्प के साथ प्रगति करनी चाहिए। यहाँ प्रयुक्त तेजः शब्द क्षत्रियों के लिए है। क्षत्रियों को दुर्बलों को संरक्षण देने में समर्थ होने हेतु सदा अत्यन्त बलवान् होना चाहिए। उन्हें स्वयं को अहिंसक के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। यदि हिंसा अपेक्षित हो, तो उन्हें उसका प्रदर्शन करना ही चाहिए।

शौचम् का अर्थ है शुचिता—केवल मन तथा शरीर में ही नहीं, अपितु मनुष्य के व्यवहार में भी। यह विशेष रूप से व्यापारी वर्ग के लिए है, जिन्हें काले बाज़ार में लेन-देन नहीं करना चाहिए। नातिमानिता अर्थात् मान की अपेक्षा न करना, शूद्रों अर्थात् श्रमिक वर्ग पर लागू होता है, जो वैदिक विधानों के अनुसार चारों वर्गों में निम्नतम माने जाते हैं। उन्हें अनावश्यक प्रतिष्ठा या मान से फूलना नहीं चाहिए तथा अपनी स्थिति में बने रहना चाहिए। सामाजिक व्यवस्था के निर्वाह हेतु उच्च वर्ग को सम्मान अर्पित करना शूद्रों का कर्तव्य है।

यहाँ वर्णित ये समस्त सोलह योग्यताएँ दिव्य गुण हैं। सामाजिक व्यवस्था की भिन्न-भिन्न स्थितियों के अनुसार इनका अनुशीलन किया जाना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यद्यपि भौतिक परिस्थितियाँ दुःखमय हैं, फिर भी यदि समस्त वर्गों के मनुष्यों द्वारा अभ्यास से ये गुण विकसित किए जाएँ, तो क्रमशः दिव्य बोध के सर्वोच्च स्तर तक उठना सम्भव है।