अध्याय 15 · 3 / 19
15.3-4
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
न—नहीं; रूपम्—रूप; अस्य—इस वृक्ष का; इह—इस जगत् में; तथा—भी; उपलभ्यते—अनुभव किया जा सकता है; न—कभी नहीं; अन्तः—अन्त; न—कभी नहीं; च—भी; आदिः—आरम्भ; न—कभी नहीं; च—भी; सम्प्रतिष्ठा—आधार; अश्वत्थम्—वटवृक्ष; एनम्—इस; सुविरूढ—दृढ़तापूर्वक; मूलम्—जड़ जमाए; असंग-शस्त्रेण—अनासक्ति रूपी शस्त्र से; दृढेन—दृढ़; छित्त्वा—काटकर; ततः—तत्पश्चात्; पदम्—स्थिति; तत्—उस; परिमार्गितव्यम्—खोजना होता है; यस्मिन्—जहाँ; गताः—जाने पर; न—कभी नहीं; निवर्तन्ति—लौटते हैं; भूयः—पुनः; तम्—उसको; एव—निश्चय ही; च—भी; आद्यम्—आदि; पुरुषम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; प्रपद्ये—शरण लो; यतः—जिनसे; प्रवृत्तिः—आरम्भ; प्रसृता—विस्तार; पुराणी—अति प्राचीन।
इस वृक्ष का वास्तविक रूप इस संसार में अनुभव नहीं किया जा सकता। कोई नहीं समझ सकता कि इसका अन्त कहाँ है, आरम्भ कहाँ है, अथवा इसका आधार कहाँ है। किन्तु दृढ़ संकल्प के साथ मनुष्य को अनासक्ति रूपी शस्त्र से इस वृक्ष को काट डालना चाहिए। ऐसा करते हुए उसे उस स्थान को खोजना चाहिए, जहाँ एक बार जाकर कोई पुनः नहीं लौटता, और वहाँ उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेनी चाहिए, जिनसे सब कुछ आरम्भ हुआ है और जिनमें अनादि काल से सब कुछ स्थित है।
अब स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस वटवृक्ष का वास्तविक रूप इस भौतिक जगत् में नहीं समझा जा सकता। चूँकि मूल ऊपर की ओर है, अतः वास्तविक वृक्ष का विस्तार दूसरे छोर पर है। कोई नहीं देख सकता कि वृक्ष कितनी दूर तक फैला है, और न ही कोई इस वृक्ष का आरम्भ देख सकता है। फिर भी मनुष्य को इसका कारण खोजना होता है। “मैं अपने पिता का पुत्र हूँ, मेरे पिता अमुक-अमुक व्यक्ति के पुत्र हैं, आदि।” इस प्रकार खोजते-खोजते मनुष्य ब्रह्मा तक पहुँचता है, जो गर्भोदकशायी विष्णु से उत्पन्न होते हैं। अन्ततः, इस प्रकार जब मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचता है, तब अनुसन्धान-कार्य का अन्त होता है। मनुष्य को उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ज्ञानी व्यक्तियों की संगति द्वारा इस वृक्ष के उस उद्गम, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को खोजना होता है। तब समझ के द्वारा वह क्रमशः यथार्थ के इस मिथ्या प्रतिबिम्ब से अनासक्त हो जाता है, और ज्ञान के द्वारा वह सम्बन्ध को काट सकता है और वास्तव में वास्तविक वृक्ष में स्थित हो सकता है।
इस सन्दर्भ में असंग शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विषय-भोग तथा भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की आसक्ति अत्यन्त प्रबल है। अतः मनुष्य को प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित आध्यात्मिक विज्ञान की विवेचना द्वारा अनासक्ति सीखनी चाहिए, और उसे उन व्यक्तियों से सुनना चाहिए जो वास्तव में ज्ञानी हैं। भक्तगण की संगति में ऐसी विवेचना के फलस्वरूप मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचता है। तब सर्वप्रथम उसे यही करना चाहिए कि उनकी शरण ले। उस स्थान का वर्णन यहाँ दिया गया है, जहाँ जाकर कोई इस मिथ्या प्रतिबिम्बित वृक्ष में पुनः नहीं लौटता। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ही वह आदि मूल हैं, जिनसे सब कुछ उद्भूत हुआ है। उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिए मनुष्य को केवल शरण लेनी होती है, और यह श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा भक्ति सम्पन्न करने का फल है। वे ही इस भौतिक जगत् के विस्तार का कारण हैं। इसे स्वयं भगवान् ने पहले ही समझा दिया है : अहं सर्वस्य प्रभवः। “मैं सब कुछ का उद्गम हूँ।”
अतः भौतिक जीवन के इस प्रबल वटवृक्ष के बन्धन से बाहर निकलने के लिए मनुष्य को श्रीकृष्ण की शरण लेनी चाहिए। ज्यों ही कोई श्रीकृष्ण की शरण लेता है, वह इस भौतिक विस्तार से स्वतः ही अनासक्त हो जाता है।