अध्याय 15 · 4 / 19
15.5
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
निर्—रहित; मान—सम्मान; मोहाः—मोह; जित—जीतकर; संग—संगति; दोषाः—दोष; अध्यात्म—आध्यात्मिक; नित्याः—नित्यता; विनिवृत्त—समाप्त; कामाः—काम; द्वन्द्वैः—द्वैत से; विमुक्ताः—मुक्त; सुख-दुःख—सुख तथा दुःख; संज्ञैः—नामक; गच्छन्ति—प्राप्त करते हैं; अमूढाः—अमोहित; पदम्—स्थिति; अव्ययम्—नित्य; तत्—उस।
जो मोह, मिथ्या प्रतिष्ठा तथा मिथ्या संगति से मुक्त है, जो नित्य को समझता है, जो भौतिक काम से रहित है तथा सुख और दुःख के द्वैत से मुक्त है, और जो पूर्ण पुरुष की शरण लेना जानता है, वह उस नित्य राज्य को प्राप्त करता है।
शरणागति की प्रक्रिया का यहाँ अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया गया है। प्रथम योग्यता यह है कि मनुष्य को अहंकार से मोहित नहीं होना चाहिए। चूँकि बद्धजीव अहंकारग्रस्त रहता है, स्वयं को भौतिक प्रकृति का स्वामी मानता है, अतः उसके लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेना अत्यन्त कठिन है। मनुष्य को वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यह जान लेना चाहिए कि वह भौतिक प्रकृति का स्वामी नहीं है; पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही स्वामी हैं। जब मनुष्य अहंकार से उत्पन्न मोह से मुक्त हो जाता है, तब वह शरणागति की प्रक्रिया आरम्भ कर सकता है। जो इस भौतिक जगत् में सदा किसी सम्मान की प्रत्याशा रखता है, उसके लिए पूर्ण पुरुष की शरण लेना सम्भव नहीं। अहंकार मोह के कारण होता है, क्योंकि यद्यपि मनुष्य यहाँ आता है, थोड़े समय ठहरता है और फिर चला जाता है, तथापि उसकी यह मूर्खतापूर्ण धारणा रहती है कि वह संसार का स्वामी है। इस प्रकार वह सब वस्तुओं को जटिल बना देता है, और सदा संकट में रहता है। समूचा संसार इसी धारणा के अधीन चलता है। लोग यह मानते हैं कि यह भूमि, यह पृथ्वी, मनुष्य-समाज की है, और उन्होंने इस मिथ्या धारणा के अधीन भूमि का विभाजन कर लिया है कि वे ही इसके स्वामी हैं। मनुष्य को इस मिथ्या धारणा से बाहर निकलना होता है कि मनुष्य-समाज इस संसार का स्वामी है। जब मनुष्य ऐसी मिथ्या धारणा से मुक्त हो जाता है, तब वह पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय अनुरागों से उत्पन्न सभी मिथ्या संगतियों से मुक्त हो जाता है। ये कूट संगतियाँ मनुष्य को इस भौतिक जगत् से बाँधती हैं। इस अवस्था के पश्चात् मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान का विकास करना होता है। उसे इस ज्ञान का अनुशीलन करना होता है कि वस्तुतः उसका अपना क्या है और वस्तुतः उसका अपना क्या नहीं है। और जब मनुष्य को वस्तुओं का यथार्थ बोध हो जाता है, तब वह सुख और दुःख, हर्ष और पीड़ा जैसी सभी द्वैत-धारणाओं से मुक्त हो जाता है। वह ज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है; तब उसके लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेना सम्भव होता है।