हि

अध्याय 15 · 5 / 19

15.6

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥

न—नहीं; तत्—उसको; भासयते—प्रकाशित करता है; सूर्यः—सूर्य; न—न तो; शशाङ्कः—चन्द्रमा; न—न ही; पावकः—अग्नि, विद्युत; यत्—जहाँ; गत्वा—जाकर; न—कभी नहीं; निवर्तन्ते—लौटते हैं; तत् धाम—वह धाम; परमम्—परम; मम—मेरा।

मेरा वह धाम न तो सूर्य अथवा चन्द्रमा से, और न ही विद्युत से प्रकाशित होता है। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह इस भौतिक जगत् में पुनः कभी नहीं लौटता।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के धाम—आध्यात्मिक जगत्—का यहाँ वर्णन किया गया है, जो कृष्णलोक, गोलोक वृन्दावन के नाम से विख्यात है। आध्यात्मिक आकाश में सूर्य के प्रकाश, चन्द्रमा के प्रकाश, अग्नि अथवा विद्युत की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि वहाँ सभी लोक स्वयं-प्रकाशित हैं। इस ब्रह्माण्ड में हमारे पास केवल एक ही स्वयं-प्रकाशित लोक है, सूर्य, किन्तु आध्यात्मिक आकाश के सभी लोक स्वयं-प्रकाशित हैं। उन समस्त लोकों (जो वैकुण्ठ कहलाते हैं) का देदीप्यमान तेज ही वह दीप्तिमान आकाश बनाता है, जो ब्रह्मज्योति के नाम से विख्यात है। वस्तुतः यह तेज श्रीकृष्ण के लोक, गोलोक वृन्दावन से उद्भूत होता है। उस दीप्तिमान तेज का एक अंश महत्-तत्त्व, अर्थात् भौतिक जगत् से आच्छादित है। इसके अतिरिक्त, उस दीप्तिमान आकाश का अधिकांश भाग आध्यात्मिक लोकों से परिपूर्ण है, जो वैकुण्ठ कहलाते हैं, जिनमें प्रमुख गोलोक वृन्दावन है।

जब तक जीव इस अन्धकारमय भौतिक जगत् में है, तब तक वह बद्ध जीवन में है, किन्तु ज्यों ही वह इस भौतिक जगत् के मिथ्या, विकृत वृक्ष को काटकर आध्यात्मिक आकाश को प्राप्त करता है, वह मुक्त हो जाता है। तब उसके यहाँ पुनः लौटने की कोई सम्भावना नहीं रहती। अपने बद्ध जीवन में जीव स्वयं को इस भौतिक जगत् का स्वामी मानता है, किन्तु अपनी मुक्त अवस्था में वह आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश करता है और परमेश्वर का पार्षद बन जाता है। वहाँ वह नित्य आनन्द, नित्य जीवन तथा पूर्ण ज्ञान का भोग करता है।

मनुष्य को इस जानकारी से मुग्ध हो जाना चाहिए। उसे यह इच्छा करनी चाहिए कि वह स्वयं को उस नित्य जगत् में स्थानान्तरित कर ले और यथार्थ के इस मिथ्या प्रतिबिम्ब से अपने को निकाल ले। जो इस भौतिक जगत् से अत्यधिक आसक्त है, उसके लिए उस आसक्ति को काटना अत्यन्त कठिन है, किन्तु यदि वह कृष्णभावनामृत को अपना ले, तो क्रमशः अनासक्त होने की सम्भावना है। मनुष्य को भक्तगण की, अर्थात् उन व्यक्तियों की संगति करनी चाहिए जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं। मनुष्य को कृष्णभावनामृत को समर्पित किसी समाज को खोजना चाहिए और यह सीखना चाहिए कि भक्ति कैसे सम्पन्न की जाए। इस प्रकार वह इस भौतिक जगत् के प्रति अपनी आसक्ति को काट सकता है। मनुष्य केवल गैरिक वस्त्र धारण करके भौतिक जगत् के आकर्षण से अनासक्त नहीं हो सकता। उसे भगवान् की भक्ति में आसक्त होना ही होगा। अतः मनुष्य को इसे अत्यन्त गम्भीरता से लेना चाहिए कि बारहवें अध्याय में वर्णित भक्ति ही वास्तविक वृक्ष के इस मिथ्या प्रतिरूप से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है। चौदहवें अध्याय में भौतिक प्रकृति द्वारा सभी प्रकार की प्रक्रियाओं के संदूषण का वर्णन किया गया है। केवल भक्ति को ही विशुद्ध रूप से दिव्य बताया गया है।

यहाँ परमं मम शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वस्तुतः प्रत्येक कोना-कोना परमेश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु आध्यात्मिक जगत् परमम् है, छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण। उपनिषदों में भी इसकी पुष्टि होती है कि आध्यात्मिक जगत् में सूर्य के प्रकाश अथवा चन्द्रमा के प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि समूचा आध्यात्मिक आकाश परमेश्वर की अन्तरंगा शक्ति से प्रकाशित होता है। वह परम धाम केवल शरणागति से ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य किसी साधन से नहीं।