हि

अध्याय 15 · 6 / 19

15.7

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥

मम—मेरे; एव—निश्चय ही; अंशः—खण्डांश; जीव-लोके—बद्ध जीवन के जगत् में; जीव-भूतः—बद्ध जीव; सनातनः—नित्य; मनः—मन; षष्ठानि—छह; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; प्रकृति—भौतिक प्रकृति; स्थानि—स्थित; कर्षति—कठोर संघर्ष करता है।

इस बद्ध जगत् के जीव मेरे नित्य खण्डांश हैं। बद्ध जीवन के कारण वे मन सहित छह इन्द्रियों के साथ अत्यन्त कठोर संघर्ष कर रहे हैं।

इस श्लोक में जीव की पहचान स्पष्ट रूप से दी गई है। जीव परमेश्वर का नित्य खण्डांश है—नित्यरूप से। ऐसा नहीं है कि वह अपने बद्ध जीवन में व्यक्तित्व धारण करता है और अपनी मुक्त अवस्था में परमेश्वर के साथ एक हो जाता है। वह नित्य रूप से खण्डित है। स्पष्ट रूप से कहा गया है, सनातनः। वैदिक मत के अनुसार परमेश्वर असंख्य विस्तारों में स्वयं को प्रकट तथा विस्तृत करते हैं, जिनमें प्रमुख विस्तार विष्णु-तत्त्व कहलाते हैं, और गौण विस्तार जीव कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में, विष्णु-तत्त्व उनका स्वांश विस्तार है, और जीव विभिन्नांश विस्तार हैं। अपने स्वांश विस्तार से वे विविध रूपों में प्रकट होते हैं, जैसे भगवान् श्रीराम, नृसिंहदेव, विष्णुमूर्ति तथा वैकुण्ठ लोकों के सभी अधिष्ठाता देव। विभिन्नांश विस्तार, अर्थात् जीव, नित्य रूप से सेवक हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वांश विस्तार, अर्थात् भगवान् की व्यष्टि पहचानें, सदा विद्यमान रहती हैं। इसी प्रकार, जीवों के विभिन्नांश विस्तारों की भी अपनी पहचानें हैं। परमेश्वर के खण्डांश होने के कारण जीवों में भी खण्डांश-गुण हैं, जिनमें स्वतन्त्रता एक है। प्रत्येक जीव में एक व्यष्टि आत्मा, उसका वैयक्तिक व्यक्तित्व तथा स्वतन्त्रता का एक सूक्ष्म रूप है। उस स्वतन्त्रता के दुरुपयोग से मनुष्य बद्धजीव बन जाता है, और स्वतन्त्रता के उचित उपयोग से वह सदा मुक्त रहता है। दोनों ही दशाओं में वह गुणात्मक रूप से नित्य है, जैसे परमेश्वर हैं। अपनी मुक्त अवस्था में वह इस भौतिक दशा से मुक्त रहता है, और वह भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न रहता है; अपने बद्ध जीवन में वह भौतिक प्रकृति के गुणों से अभिभूत रहता है, और वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा को भूल जाता है। फलस्वरूप उसे भौतिक जगत् में अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अत्यन्त कठोर संघर्ष करना पड़ता है।

जीव—केवल मनुष्य तथा बिल्लियाँ और कुत्ते ही नहीं, अपितु भौतिक जगत् के बड़े नियन्ता—ब्रह्मा, शिवजी, और यहाँ तक कि विष्णु भी—सभी परमेश्वर के खण्डांश हैं। ये सभी नित्य हैं, क्षणिक प्रकटीकरण नहीं। कर्षति (कठोर संघर्ष अथवा जूझना) शब्द अत्यन्त सार्थक है। बद्धजीव बँधा हुआ है, मानो लौह श्रृंखलाओं से जकड़ा हो। वह मिथ्या अहंकार से बँधा हुआ है, और मन ही वह प्रमुख कारक है जो इस भौतिक अस्तित्व में उसे संचालित करता है। जब मन सत्त्वगुण में होता है, तब उसके कर्म शुभ होते हैं; जब मन रजोगुण में होता है, तब उसके कर्म क्लेशकर होते हैं; और जब मन तमोगुण में होता है, तब वह जीवन की निम्न योनियों में भ्रमण करता है। तथापि इस श्लोक में यह स्पष्ट है कि बद्धजीव भौतिक शरीर से, मन तथा इन्द्रियों सहित, आच्छादित है, और जब वह मुक्त होता है, तब यह भौतिक आवरण नष्ट हो जाता है, किन्तु उसका आध्यात्मिक शरीर अपने व्यष्टि रूप में प्रकट हो जाता है। माध्यन्दिनायन-श्रुति में निम्नलिखित जानकारी दी गई है : स वा एष ब्रह्म-निष्ठ इदं शरीरं मर्त्यम् अतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा शृणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वम् अनुभवति। यहाँ कहा गया है कि जब जीव इस भौतिक शरीर का त्याग करता है और आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करता है, तब वह अपने आध्यात्मिक शरीर को पुनः प्राप्त कर लेता है, और अपने आध्यात्मिक शरीर में वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आमने-सामने देख सकता है। वह उन्हें आमने-सामने सुन तथा उनसे बात कर सकता है, और पूर्ण पुरुष को उनके यथार्थ रूप में समझ सकता है। स्मृति में भी यह बताया गया है कि आध्यात्मिक लोकों में प्रत्येक जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समान आकृति वाले शरीरों में निवास करता है। जहाँ तक शरीर की रचना का प्रश्न है, खण्डांश जीवों तथा विष्णुमूर्ति के विस्तारों में कोई भेद नहीं। दूसरे शब्दों में, मुक्ति के समय जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा से एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है।

ममैवांशः (परमेश्वर के खण्डांश) शब्द भी अत्यन्त सार्थक है। परमेश्वर का खण्डांश किसी भौतिक टूटे हुए भाग के समान नहीं है। हम द्वितीय अध्याय में पहले ही समझ चुके हैं कि आत्मा के टुकड़े नहीं किए जा सकते। यह खण्ड भौतिक रूप से परिकल्पित नहीं है। यह उस पदार्थ के समान नहीं है जिसके टुकड़े किए जा सकते हैं और जिन्हें पुनः जोड़ा जा सकता है। वह धारणा यहाँ लागू नहीं होती, क्योंकि संस्कृत शब्द सनातन (नित्य) प्रयुक्त हुआ है। खण्डांश नित्य है। द्वितीय अध्याय के आरम्भ में भी यह कहा गया है कि (देहिनोऽस्मिन् यथा) प्रत्येक व्यष्टि शरीर में परमेश्वर का खण्डांश विद्यमान है। वह खण्डांश, जब शारीरिक बन्धन से मुक्त होता है, तब आध्यात्मिक आकाश में किसी आध्यात्मिक लोक पर अपने मूल आध्यात्मिक शरीर को पुनः प्राप्त कर लेता है और परमेश्वर की संगति का भोग करता है। तथापि यहाँ यह समझा जाता है कि जीव, परमेश्वर का खण्डांश होने के कारण, गुणात्मक रूप से एक है, ठीक जैसे स्वर्ण के खण्डांश भी स्वर्ण ही होते हैं।