हि

अध्याय 15 · 7 / 19

15.8

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥

शरीरम्—शरीर; यत्—जितना; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; यत्—जिसको; च—भी; अपि—वस्तुतः; उत्क्रामति—त्याग देता है; ईश्वरः—शरीर का स्वामी; गृहीत्वा—ग्रहण करके; एतानि—इन सबको; संयाति—चला जाता है; वायुः—वायु; गन्धान्—गन्ध; इव—समान; आशयात्—पुष्प से।

भौतिक जगत् में जीव अपनी जीवन की विभिन्न धारणाओं को एक शरीर से दूसरे शरीर में उसी प्रकार ले जाता है, जैसे वायु सुगन्ध को ले जाती है।

यहाँ जीव को ईश्वर, अर्थात् अपने शरीर का नियन्ता बताया गया है। यदि वह चाहे, तो अपने शरीर को उच्चतर श्रेणी में बदल सकता है, और यदि वह चाहे, तो निम्नतर श्रेणी में जा सकता है। सूक्ष्म स्वतन्त्रता वहाँ है। उसका शरीर जो परिवर्तन झेलता है, वह उसी पर निर्भर है। मृत्यु के समय उसने जो चेतना निर्मित की है, वही उसे अगले प्रकार के शरीर तक ले जाएगी। यदि उसने अपनी चेतना बिल्ली अथवा कुत्ते के समान बना ली है, तो वह निश्चय ही बिल्ली अथवा कुत्ते के शरीर में बदल जाएगा। और यदि उसने अपनी चेतना दिव्य गुणों पर स्थिर कर ली है, तो वह देवता के रूप में बदल जाएगा। और यदि वह कृष्णभावनामृत में है, तो वह आध्यात्मिक जगत् में कृष्णलोक को स्थानान्तरित कर दिया जाएगा और श्रीकृष्ण की संगति करेगा। यह मिथ्या दावा है कि इस शरीर के विनाश के पश्चात् सब कुछ समाप्त हो जाता है। जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करती रहती है, और उसका वर्तमान शरीर तथा वर्तमान कर्म ही उसके अगले शरीर की पृष्ठभूमि हैं। मनुष्य कर्म के अनुसार भिन्न शरीर प्राप्त करता है, और उसे यथासमय इस शरीर का त्याग करना ही होता है। यहाँ कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर, जो अगले शरीर की धारणा को धारण करता है, अगले जीवन में दूसरे शरीर का विकास करता है। एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करने तथा शरीर में रहते हुए संघर्ष करने की यह प्रक्रिया कर्षति, अर्थात् अस्तित्व के लिए संघर्ष कहलाती है।