हि

अध्याय 16 · 2 / 19

16.4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥

दम्भः—अहंकार; दर्पः—घमण्ड; अभिमानः—दर्प; च—तथा; क्रोधः—क्रोध; पारुष्यम्—कठोरता; एव—निश्चय ही; च—तथा; अज्ञानम्—अज्ञान; च—तथा; अभिजातस्य—जिसने जन्म लिया है; पार्थ—हे पृथापुत्र; सम्पदम्—प्रकृति; आसुरीम्—आसुरी।

हे पृथापुत्र! घमण्ड, अहंकार, क्रोध, दर्प, कठोरता तथा अज्ञान—ये गुण आसुरी प्रकृति वालों में होते हैं।

इस श्लोक में नरक के राजमार्ग का वर्णन है। आसुरी जन धर्म तथा आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नति का प्रदर्शन करना चाहते हैं, यद्यपि वे सिद्धान्तों का पालन नहीं करते। वे किसी प्रकार की शिक्षा अथवा प्रचुर धन रखने में सदा घमण्डी अथवा दर्पयुक्त रहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरे उनकी पूजा करें, और सम्माननीयता की माँग करते हैं, यद्यपि वे सम्मान के योग्य नहीं होते। तुच्छ बातों पर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो जाते हैं और मृदुता से नहीं, अपितु कठोरता से बोलते हैं। वे नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। वे सब कुछ स्वेच्छाचारी ढंग से, अपनी इच्छा के अनुसार करते हैं, और किसी अधिकारी को नहीं मानते। ये आसुरी गुण उनके द्वारा अपनी माताओं के गर्भ में शरीरों के आरम्भ से ही ग्रहण कर लिए जाते हैं, और जैसे-जैसे वे बढ़ते हैं, वे इन समस्त अशुभ गुणों को प्रकट करते हैं।