हि

अध्याय 16 · 13 / 19

16.18

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥

अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार; बलम्—बल; दर्पम्—घमण्ड; कामम्—काम; क्रोधम्—क्रोध; च—भी; संश्रिताः—शरण लेकर; माम्—मुझे; आत्म—अपने; पर-देहेषु—अन्य शरीरों में; प्रद्विषन्तः—निन्दा करते हैं; अभ्यसूयकाः—ईर्ष्यालु।

मिथ्या अहंकार, बल, घमण्ड, काम तथा क्रोध से भ्रमित होकर, असुर अपने तथा अन्यों के शरीरों में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ईर्ष्या करता है, और वास्तविक धर्म की निन्दा करता है।

आसुरी व्यक्ति, सदा भगवान् की सर्वोच्चता के विरुद्ध होने के कारण, शास्त्रों में विश्वास करना नहीं चाहता। वह शास्त्रों से तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अस्तित्व से—दोनों से ईर्ष्या करता है। यह उसकी तथाकथित प्रतिष्ठा तथा उसके धन एवं बल के संचय के कारण होता है। वह नहीं जानता कि वर्तमान जीवन अगले जीवन की तैयारी है। यह न जानने के कारण, वह वस्तुतः अपने ही प्रति, तथा अन्यों के प्रति भी ईर्ष्यालु है। वह अन्य शरीरों पर तथा अपने शरीर पर हिंसा करता है। वह भगवान् के परम नियन्त्रण की चिन्ता नहीं करता, क्योंकि उसे कोई ज्ञान नहीं है। शास्त्रों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ईर्ष्या करते हुए, वह ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध मिथ्या तर्क प्रस्तुत करता है तथा शास्त्रीय अधिकार का खण्डन करता है। वह प्रत्येक कर्म में स्वयं को स्वतन्त्र तथा बलवान् मानता है। वह सोचता है कि चूँकि बल, शक्ति अथवा धन में कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता, अतः वह किसी भी प्रकार से कर्म कर सकता है और कोई उसे रोक नहीं सकता। यदि उसका कोई शत्रु है जो उसके इन्द्रिय-कर्मों की प्रगति को रोक सके, तो वह अपने ही बल से उसे काट गिराने की योजना बनाता है।