अध्याय 16 · 19 / 19
16.24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
तस्मात्—अतः; शास्त्रम्—शास्त्र; प्रमाणम्—प्रमाण; ते—तुम्हारा; कार्य—कर्तव्य; अकार्य—निषिद्ध कर्म; व्यवस्थितौ—निर्धारण में; ज्ञात्वा—जानकर; शास्त्र—शास्त्र के; विधान—नियम; उक्तम्—जैसा घोषित किया गया है; कर्म—कर्म; कर्तुम्—करने हेतु; इह अर्हसि—तुम्हें करना चाहिए।
मनुष्य को शास्त्रों के नियमों द्वारा यह समझना चाहिए कि कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है। ऐसे नियमों एवं विधियों को जानकर मनुष्य को इस प्रकार कर्म करना चाहिए कि वह धीरे-धीरे उन्नत हो सके।
जैसा कि पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है, वेदों के समस्त नियम और विधियाँ श्रीकृष्ण को जानने के लिए ही हैं। यदि कोई भगवद्गीता से श्रीकृष्ण को समझ ले और कृष्णभावनामृत में स्थित होकर भक्ति में संलग्न हो जाए, तो वह वैदिक साहित्य द्वारा प्रदत्त ज्ञान की सर्वोच्च पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस प्रक्रिया को अत्यन्त सुगम बना दिया : उन्होंने लोगों से केवल हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करने, भगवान् की भक्ति में संलग्न होने तथा अर्चाविग्रह को अर्पित भोजन के अवशेष ग्रहण करने को कहा। जो व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से इन समस्त भक्ति-कर्मों में संलग्न है, उसे समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन कर चुका हुआ ही समझना चाहिए। वह पूर्ण रूप से निष्कर्ष पर पहुँच गया है। निस्सन्देह, जो साधारण व्यक्ति कृष्णभावनामृत में नहीं हैं अथवा जो भक्ति में संलग्न नहीं हैं, उनके लिए क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका निर्णय वेदों के आदेशों द्वारा होना चाहिए। मनुष्य को बिना तर्क किये तदनुसार आचरण करना चाहिए। इसी को शास्त्र अर्थात् धर्मग्रन्थ के सिद्धान्तों का पालन कहते हैं। शास्त्र उन चार प्रमुख दोषों से रहित है जो बद्धजीव में दृष्टिगोचर होते हैं : अपूर्ण इन्द्रियाँ, छल करने की प्रवृत्ति, भूल करने की निश्चितता तथा माया में पड़ने की निश्चितता। बद्ध जीवन के ये चार प्रमुख दोष मनुष्य को नियम और विधियाँ प्रस्तुत करने के अयोग्य बना देते हैं। अतएव शास्त्र में वर्णित नियम और विधियाँ—इन दोषों से परे होने के कारण—समस्त महान् सन्तों, आचार्यों तथा महात्माओं द्वारा बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार की जाती हैं।
भारत में आध्यात्मिक बोध के अनेक सम्प्रदाय हैं, जिन्हें सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है : निर्विशेषवादी तथा सविशेषवादी। तथापि दोनों ही अपना जीवन वेदों के सिद्धान्तों के अनुसार चलाते हैं। शास्त्रों के सिद्धान्तों का पालन किये बिना कोई अपने को सिद्धावस्था तक नहीं उठा सकता। अतः जो वास्तव में शास्त्रों के तात्पर्य को समझता है, उसे ही सौभाग्यशाली माना जाता है।
मानव-समाज में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के सिद्धान्तों के प्रति विमुखता ही समस्त अधःपतनों का कारण है। यही मनुष्य-जीवन का सबसे बड़ा अपराध है। इसी कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भौतिक शक्ति माया हमें त्रिविध तापों के रूप में सदा कष्ट देती रहती है। यह भौतिक शक्ति प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित है। परमेश्वर को समझने का मार्ग खुलने से पूर्व मनुष्य को कम-से-कम सत्त्वगुण तक अपने को उठाना होता है। सत्त्वगुण के स्तर तक अपने को उठाये बिना मनुष्य रजोगुण और तमोगुण में ही बना रहता है, जो आसुरी जीवन के कारण हैं। रजोगुण और तमोगुण में स्थित लोग शास्त्रों का उपहास करते हैं, सन्त पुरुष का उपहास करते हैं, तथा आध्यात्मिक गुरु के यथार्थ बोध का उपहास करते हैं, और वे शास्त्रों के नियमों की कोई परवाह नहीं करते। भक्ति की महिमा सुनने पर भी वे आकृष्ट नहीं होते। इस प्रकार वे अपनी उन्नति का अपना ही मार्ग गढ़ लेते हैं। ये मानव-समाज के कुछ ऐसे दोष हैं, जो जीवन की आसुरी अवस्था की ओर ले जाते हैं। तथापि यदि कोई किसी यथार्थ एवं प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में रहने में समर्थ हो, जो उसे उन्नति के मार्ग पर, उच्चतर अवस्था की ओर ले जा सके, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय “दैवी एवं आसुरी प्रकृति” विषयक भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।