अध्याय 17 · 1 / 24
17.1
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; ये—जो लोग; शास्त्र-विधिम्—शास्त्र के विधि-विधान; उत्सृज्य—त्यागकर; यजन्ते—पूजा करते हैं; श्रद्धया—पूर्ण श्रद्धा से; अन्विताः—युक्त; तेषाम्—उनकी; निष्ठा—श्रद्धा; तु—किन्तु; का—क्या है; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; सत्त्वम्—सतोगुण में; आहो—कहा; रजः—रजोगुण में; तमः—तमोगुण में।
अर्जुन ने कहा, हे श्रीकृष्ण! जो व्यक्ति शास्त्र के सिद्धान्तों का पालन नहीं करता, अपितु अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करता है, उसकी स्थिति क्या होती है? वह सतोगुण में है, रजोगुण में है अथवा तमोगुण में?
चतुर्थ अध्याय के उनतालीसवें श्लोक में कहा गया है कि किसी विशेष प्रकार की पूजा के प्रति श्रद्धावान् व्यक्ति क्रमशः ज्ञान की अवस्था तक उन्नत होता है और शान्ति एवं समृद्धि की परम सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है। सोलहवें अध्याय में यह निष्कर्ष निकाला गया कि जो शास्त्रों में निर्दिष्ट सिद्धान्तों का पालन नहीं करता, वह असुर अर्थात् राक्षस कहलाता है, और जो शास्त्रीय आदेशों का श्रद्धापूर्वक पालन करता है, वह देव अर्थात् देवता कहलाता है। अब, यदि कोई श्रद्धा सहित ऐसे कुछ नियमों का पालन करे जो शास्त्रीय आदेशों में उल्लिखित नहीं हैं, तो उसकी स्थिति क्या होगी? अर्जुन के इस सन्देह का निवारण श्रीकृष्ण को करना है। जो लोग किसी मनुष्य को चुनकर तथा उसमें अपनी श्रद्धा रखकर किसी प्रकार के ईश्वर की रचना कर लेते हैं, क्या वे सतोगुण में, रजोगुण में अथवा तमोगुण में पूजा कर रहे हैं? क्या ऐसे व्यक्ति जीवन की सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं? क्या उनके लिए यह सम्भव है कि वे वास्तविक ज्ञान में स्थित हों और अपने को परम सिद्ध अवस्था तक उन्नत करें? जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों का पालन नहीं करते, किन्तु किसी वस्तु में श्रद्धा रखते हैं तथा देवों, देवताओं एवं मनुष्यों की पूजा करते हैं, क्या वे अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त करते हैं? अर्जुन ये प्रश्न श्रीकृष्ण के समक्ष रख रहे हैं।