अध्याय 16 · 3 / 19
16.5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥
दैवी—दिव्य; सम्पत्—प्रकृति; विमोक्षाय—मोक्ष के लिए; निबन्धाय—बन्धन के लिए; आसुरी—आसुरी गुण; मता—मानी जाती है; मा—मत; शुचः—चिन्ता करो; सम्पदम्—प्रकृति; दैवीम्—दिव्य; अभिजातः—जन्मे हुए; असि—तुम हो; पाण्डव—हे पाण्डुपुत्र।
दिव्य गुण मोक्ष के लिए अनुकूल हैं, जबकि आसुरी गुण बन्धन का कारण बनते हैं। हे पाण्डुपुत्र! चिन्ता मत करो, क्योंकि तुम दिव्य गुणों के साथ जन्मे हो।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह कहकर प्रोत्साहित किया कि वह आसुरी गुणों के साथ जन्मा नहीं है। उसका युद्ध में सम्मिलित होना आसुरी नहीं था, क्योंकि वह पक्ष-विपक्ष पर विचार कर रहा था। वह विचार कर रहा था कि भीष्म तथा द्रोण जैसे सम्माननीय व्यक्तियों का वध किया जाना चाहिए या नहीं, अतः वह क्रोध, मिथ्या प्रतिष्ठा अथवा कठोरता के प्रभाव में कर्म नहीं कर रहा था। अतएव वह असुरों के गुण का नहीं था। क्षत्रिय अर्थात् सैनिक के लिए शत्रु पर बाण चलाना दिव्य माना जाता है, और ऐसे कर्तव्य से विरत होना आसुरी है। इसलिए अर्जुन के लिए शोक का कोई कारण नहीं था। जो कोई जीवन के विभिन्न आश्रमों के नियमित सिद्धान्तों का पालन करता है, वह दिव्य रूप से स्थित होता है।