हि

अध्याय 17 · 13 / 24

17.16

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥

मनः-प्रसादः—मन का सन्तोष; सौम्यत्वम्—दूसरों के प्रति कपटरहितता; मौनम्—गम्भीरता; आत्म—आत्मा; विनिग्रहः—संयम; भाव—स्वभाव; संशुद्धिः—शुद्धि; इति—इस प्रकार; एतत्—यह है; तपः—तप; मानसम्—मन का; उच्यते—कहा जाता है।

और प्रसन्नता, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं विचार की शुद्धता—ये मन के तप हैं।

मन को तपस्वी बनाने का अर्थ है उसे इन्द्रियतृप्ति से विरक्त करना। इसे इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह सदैव दूसरों का कल्याण करने का विचार कर सके। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचार में गम्भीरता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और सदैव इन्द्रियतृप्ति से बचना चाहिए। मनुष्य के स्वभाव को शुद्ध करने का अर्थ है कृष्णभावनाभावित होना। मन का सन्तोष केवल मन को इन्द्रिय-भोग के विचारों से दूर ले जाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। जितना अधिक हम इन्द्रिय-भोग का विचार करते हैं, उतना ही अधिक मन असन्तुष्ट होता जाता है। वर्तमान युग में हम मन को इन्द्रियतृप्ति हेतु अनेक भिन्न-भिन्न रीतियों में अनावश्यक रूप से संलग्न करते हैं, और इसलिए मन के सन्तुष्ट होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। सर्वोत्तम उपाय यह है कि मन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ा जाए, जो सन्तोषप्रद कथाओं से पूर्ण है, जैसा कि पुराणों एवं महाभारत में है। मनुष्य इस ज्ञान का लाभ उठा सकता है और इस प्रकार शुद्ध हो सकता है। मन कपट से रहित होना चाहिए, और मनुष्य को सबके कल्याण का विचार करना चाहिए। मौन का अर्थ है कि मनुष्य सदैव आत्म-साक्षात्कार का विचार करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इसी अर्थ में पूर्ण मौन का पालन करता है। मन के संयम का अर्थ है मन को इन्द्रिय-भोग से विरक्त करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में सरल होना चाहिए और इस प्रकार अपने अस्तित्व को शुद्ध करना चाहिए। ये सभी गुण मिलकर मानसिक क्रियाओं में तप का निर्माण करते हैं।