हि

अध्याय 17 · 12 / 24

17.15

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥

अनुद्वेग—उद्विग्न न करने वाले; करम्—उत्पन्न करते हुए; वाक्यम्—वचन; सत्यम्—सत्य; प्रिय—प्रिय; हितम्—हितकर; च—भी; यत्—जो; स्वाध्याय—वैदिक अध्ययन; अभ्यसनम्—अभ्यास; च—भी; एव—निश्चय ही; वाङ्मयम्—वाणी का; तपः—तप; उच्यते—कहा जाता है।

वाणी का तप सत्य एवं हितकर वचन बोलने तथा ऐसी वाणी से बचने में निहित है जो उद्वेग उत्पन्न करे। मनुष्य को नियमित रूप से वेदों का पाठ भी करना चाहिए।

मनुष्य को इस प्रकार नहीं बोलना चाहिए कि दूसरों के मन उद्विग्न हों। निस्सन्देह, जब कोई शिक्षक बोलता है, तो वह अपने शिष्यों की शिक्षा हेतु सत्य बोल सकता है, किन्तु ऐसे शिक्षक को उन अन्य व्यक्तियों से नहीं बोलना चाहिए जो उसके शिष्य नहीं हैं, यदि उससे उनके मन उद्विग्न होंगे। जहाँ तक बोलने का सम्बन्ध है, यह तप है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य को निरर्थक बातें नहीं करनी चाहिए। आध्यात्मिक मण्डलियों में बोलते समय, मनुष्य के कथनों की पुष्टि शास्त्रों द्वारा होनी चाहिए। मनुष्य जो कह रहा है, उसकी पुष्टि के लिए उसे तुरन्त शास्त्रीय प्रमाण से उद्धरण देना चाहिए। साथ ही, ऐसी बातें कानों को अत्यन्त सुखद होनी चाहिए। ऐसी चर्चाओं से मनुष्य सर्वोच्च लाभ प्राप्त कर सकता है और मानव समाज को उन्नत कर सकता है। वैदिक साहित्य का असीम भण्डार है, और मनुष्य को इसका अध्ययन करना चाहिए। यह वाणी का तप कहलाता है।