हि

अध्याय 17 · 15 / 24

17.18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥

सत्कार—आदर; मान—सम्मान; पूजा-अर्थम्—पूजा हेतु; तपः—तप; दम्भेन—गर्व से; च—भी; एव—निश्चय ही; यत्—जो; क्रियते—सम्पन्न किया जाता है; तत्—वह; इह—इस संसार में; प्रोक्तम्—कहा गया है; राजसम्—रजोगुण में; चलम्—चंचल; अध्रुवम्—अस्थायी।

वे आडम्बरपूर्ण तप एवं तपस्याएँ जो आदर, सम्मान एवं श्रद्धा प्राप्त करने के लिए सम्पन्न की जाती हैं, रजोगुण में कही जाती हैं। वे न तो स्थिर हैं और न ही स्थायी।

कभी-कभी तप एवं तपस्या लोगों को आकृष्ट करने तथा दूसरों से सम्मान, आदर एवं पूजा प्राप्त करने हेतु सम्पन्न की जाती है। रजोगुणी व्यक्ति यह व्यवस्था करते हैं कि अधीनस्थ उनकी पूजा करें तथा उन्हें अपने चरण धुलाने एवं धन अर्पित करने देते हैं। तप के सम्पादन द्वारा कृत्रिम रूप से की गई ऐसी व्यवस्थाएँ रजोगुण में मानी जाती हैं। उनके परिणाम अस्थायी होते हैं; वे कुछ समय तक चल सकते हैं, किन्तु वे स्थायी नहीं होते।