अध्याय 17 · 16 / 24
17.19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
मूढ—मूर्खतापूर्ण; ग्राहेण—प्रयास से; आत्मनः—अपने ही स्वरूप की; यत्—जो; पीडया—यातना द्वारा; क्रियते—की जाती है; तपः—तपस्या; परस्य—दूसरों का; उत्सादनार्थम्—विनाश के लिए; वा—अथवा; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कही जाती है।
और जो तपस्याएँ हठपूर्वक आत्म-यातना द्वारा मूर्खतापूर्वक की जाती हैं, अथवा जो दूसरों के विनाश या हानि के लिए की जाती हैं, वे तमोगुण में कही जाती हैं।
हिरण्यकशिपु जैसे असुरों द्वारा की गई मूर्खतापूर्ण तपस्या के उदाहरण विद्यमान हैं, जिसने अमर होने तथा देवताओं का वध करने के लिए कठोर तपस्या की। उसने ब्रह्मा से ऐसी ही वस्तुओं की प्रार्थना की, किन्तु अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा उसका वध हुआ। किसी असम्भव वस्तु के लिए तपस्या करना निश्चय ही तमोगुण में है।