अध्याय 17 · 22 / 24
17.25
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥
तत्—वह; इति—वे; अनभिसन्धाय—सकाम फल के बिना; फलम्—यज्ञ का फल; यज्ञ—यज्ञ; तपः—तपस्या; क्रियाः—कार्य; दान—दान; क्रियाः—कार्य; च—भी; विविधाः—विविध प्रकार के; क्रियन्ते—किए जाते हैं; मोक्ष-काङ्क्षिभिः—जो वास्तव में मुक्ति की इच्छा करते हैं।
मनुष्य को ‘तत्’ शब्द के साथ यज्ञ, तपस्या एवं दान करना चाहिए। ऐसे दिव्य कार्यों का प्रयोजन भौतिक बन्धन से मुक्त होना है।
आध्यात्मिक पद पर उन्नत होने के लिए मनुष्य को किसी भौतिक लाभ हेतु कर्म नहीं करना चाहिए। कर्म आध्यात्मिक राज्य में स्थानान्तरित होने के, घर लौटने के, भगवद्धाम लौटने के परम लाभ के लिए किए जाने चाहिए।