अध्याय 17 · 21 / 24
17.24
तस्माद् ॐ इत्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
तस्मात्—अतः; ॐ—ॐ से आरम्भ करते हुए; इति—इस प्रकार; उदाहृत्य—इंगित करते हुए; यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तपस्या; क्रियाः—कर्म; प्रवर्तन्ते—आरम्भ होते हैं; विधान-उक्ताः—शास्त्रीय नियम के अनुसार; सततम्—सदा; ब्रह्म-वादिनाम्—दिव्यदर्शियों के।
इस प्रकार दिव्यदर्शी परम की प्राप्ति के लिए सदा ॐ से आरम्भ करते हुए यज्ञ, दान एवं तपस्या करते हैं।
ॐ तद् विष्णोः परमं पदम्। विष्णु के चरणकमल सर्वोच्च भक्तिमय स्तर हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निमित्त समस्त कार्यों का सम्पादन समस्त क्रियाओं की पूर्णता सुनिश्चित करता है।