अध्याय 17 · 24 / 24
17.28
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
अश्रद्धया—बिना श्रद्धा के; हुतम्—सम्पन्न; दत्तम्—दिया गया; तपः—तपस्या; तप्तम्—किया गया; कृतम्—सम्पन्न; च—भी; यत्—जो; असत्—असत्; इति—इस प्रकार; उच्यते—कहा जाता है; पार्थ—हे पृथापुत्र; न—कभी नहीं; च—भी; तत्—वह; प्रेत्य—मृत्यु के पश्चात्; नो—न ही; इह—इस जीवन में।
किन्तु हे पृथापुत्र, परम में श्रद्धा के बिना किए गए यज्ञ, तपस्या एवं दान, चाहे जो भी विधि सम्पन्न की जाए, अनित्य होते हैं। वे असत् कहलाते हैं तथा इस जीवन एवं अगले, दोनों में निरर्थक होते हैं।
दिव्य उद्देश्य के बिना किया गया कोई भी कार्य—चाहे वह यज्ञ हो, दान हो या तपस्या—निरर्थक होता है। अतः इस श्लोक में घोषित किया गया है कि ऐसे कार्य निन्दनीय हैं। प्रत्येक कार्य परम के लिए कृष्णभावनामृत में किया जाना चाहिए। ऐसी श्रद्धा के बिना, तथा समुचित मार्गदर्शन के बिना, कभी कोई फल नहीं हो सकता। समस्त वैदिक शास्त्रों में परम में श्रद्धा रखने का परामर्श दिया गया है। समस्त वैदिक उपदेशों के अनुसरण में परम लक्ष्य श्रीकृष्ण को जानना ही है। इस सिद्धान्त का पालन किए बिना कोई भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सर्वोत्तम मार्ग यही है कि मनुष्य प्रारम्भ से ही किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में कृष्णभावनामृत में कर्म करे। प्रत्येक वस्तु को सफल बनाने का यही उपाय है।
बद्ध अवस्था में लोग देवताओं, प्रेतों, अथवा कुवेर जैसे यक्षों की पूजा की ओर आकृष्ट होते हैं। सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण से श्रेष्ठ है, किन्तु जो प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से परे दिव्य स्थिति में होता है। यद्यपि क्रमिक उन्नति की एक प्रक्रिया है, तथापि यदि कोई शुद्ध भक्तों की संगति से प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर ले, तो वही सर्वोत्तम मार्ग है। और इसी अध्याय में इसकी अनुशंसा की गई है। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को पहले उपयुक्त आध्यात्मिक गुरु को खोजना होगा तथा उनके निर्देशन में प्रशिक्षण ग्रहण करना होगा। तब मनुष्य परम में श्रद्धा प्राप्त कर सकता है। समय के साथ जब वह श्रद्धा परिपक्व होती है, तब उसे भगवत्प्रेम कहा जाता है। यह प्रेम ही जीवों का परम लक्ष्य है। अतः मनुष्य को प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत ग्रहण करना चाहिए। यही इस सत्रहवें अध्याय का सन्देश है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय “श्रद्धात्रय-विभाग” पर श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के तात्पर्य समाप्त होते हैं।