हि

अध्याय 18 · 1 / 74

18.1

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; संन्यासस्य—संन्यास का; महा-बाहो—हे महाबाहु; तत्त्वम्—सत्य; इच्छामि—मैं चाहता हूँ; वेदितुम्—जानना; त्यागस्य—त्याग का; च—भी; हृषीकेश—हे इन्द्रियों के स्वामी; पृथक्—पृथक् रूप से; केशी-निषूदन—हे केशी असुर के संहारक।

अर्जुन ने कहा : हे महाबाहु, मैं त्याग [त्याग] तथा संन्यास-आश्रम [संन्यास] का प्रयोजन जानना चाहता हूँ। हे केशी असुर के संहारक, हे हृषीकेश!

वस्तुतः भगवद्गीता सत्रह अध्यायों में समाप्त हो जाती है। अठारहवाँ अध्याय पूर्व में विवेचित विषयों का पूरक सारांश है। भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण इस बात पर बल देते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। इसी बिन्दु का सारांश अठारहवें अध्याय में ज्ञान के परम गुह्यतम मार्ग के रूप में दिया गया है। प्रथम छह अध्यायों में भक्ति पर बल दिया गया : योगिनाम् अपि सर्वेषाम्… “समस्त योगियों अथवा दिव्यवादियों में जो अपने अन्तर में सदा मेरा ही चिन्तन करता है, वही श्रेष्ठ है।” अगले छह अध्यायों में शुद्ध भक्ति तथा उसके स्वरूप एवं कर्म का विवेचन हुआ। तृतीय छह अध्यायों में ज्ञान, त्याग, भौतिक प्रकृति एवं दिव्य प्रकृति के कर्म तथा भक्ति का वर्णन किया गया। यह निष्कर्ष निकाला गया कि समस्त कर्म परमेश्वर के साथ संयुक्त होकर ही सम्पन्न किए जाने चाहिए, जिसका सार ॐ तत् सत् इन शब्दों में निहित है, जो विष्णु अर्थात् परम पुरुष की ओर संकेत करते हैं। भगवद्गीता के तृतीय भाग में पूर्ववर्ती आचार्यगण के दृष्टान्त तथा ब्रह्म-सूत्र अर्थात् वेदान्त-सूत्र के आधार पर भक्ति को प्रतिष्ठित किया गया, जो यह उद्धृत करता है कि भक्ति ही जीवन का परम प्रयोजन है, अन्य कुछ नहीं। कुछ निर्विशेषवादी स्वयं को वेदान्त-सूत्र के ज्ञान का एकाधिकारी मानते हैं, किन्तु वस्तुतः वेदान्त-सूत्र का अभिप्राय भक्ति को समझाना ही है, क्योंकि भगवान् स्वयं वेदान्त-सूत्र के रचयिता हैं, और वे ही उसके ज्ञाता हैं। इसका वर्णन पन्द्रहवें अध्याय में हुआ है। प्रत्येक शास्त्र में, प्रत्येक वेद में भक्ति ही लक्ष्य है। इसी की व्याख्या भगवद्गीता में की गई है।

जिस प्रकार द्वितीय अध्याय में समस्त विषयवस्तु का संक्षिप्त परिचय दिया गया, उसी प्रकार अठारहवें अध्याय में भी समस्त उपदेशों का सारांश दिया गया है। जीवन का प्रयोजन त्याग तथा प्रकृति के तीन भौतिक गुणों से ऊपर की दिव्य स्थिति की प्राप्ति बताया गया है। अर्जुन भगवद्गीता के दो भिन्न विषयों, अर्थात् त्याग (त्याग) तथा संन्यास-आश्रम (संन्यास) को स्पष्ट करना चाहते हैं। अतः वे इन दोनों शब्दों का अर्थ पूछ रहे हैं।

इस श्लोक में परमेश्वर को सम्बोधित करने हेतु प्रयुक्त दो शब्द—हृषीकेश तथा केशिनिषूदन—सार्थक हैं। हृषीकेश श्रीकृष्ण हैं, समस्त इन्द्रियों के स्वामी, जो हमें मानसिक प्रशान्ति प्राप्त करने में सदा सहायता कर सकते हैं। अर्जुन उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे समस्त विषय को इस प्रकार संक्षेप में बताएँ कि वह समभाव में स्थित रह सके। तथापि उसके मन में कुछ सन्देह हैं, और सन्देहों की तुलना सदा असुरों से की जाती है। इसी कारण वह श्रीकृष्ण को केशिनिषूदन कहकर सम्बोधित करता है। केशी एक अत्यन्त भयंकर असुर था, जिसे भगवान् ने मारा था; अब अर्जुन यह आशा कर रहा है कि श्रीकृष्ण सन्देह रूपी असुर का संहार करेंगे।