अध्याय 18 · 10 / 74
18.10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
न—कभी नहीं; द्वेष्टि—घृणा करता है; अकुशलम्—अमंगलमय; कर्म—कर्म; कुशले—मंगलमय में; न—न ही; अनुषज्जते—आसक्त होता है; त्यागी—त्यागी; सत्त्व—सतोगुण; समाविष्टः—में लीन; मेधावी—बुद्धिमान्; छिन्न—छिन्न; संशयः—समस्त सन्देह।
जो सतोगुण में स्थित हैं, जो न तो अमंगलमय कर्म से घृणा करते हैं और न ही मंगलमय कर्म में आसक्त होते हैं, उन्हें कर्म के विषय में कोई सन्देह नहीं रहता।
भगवद्गीता में कहा गया है कि मनुष्य किसी भी समय कर्म का त्याग नहीं कर सकता। अतः जो श्रीकृष्ण के लिए कर्म करता है और सकाम फलों का भोग नहीं करता, जो सब कुछ श्रीकृष्ण को अर्पित कर देता है, वही वस्तुतः त्यागी है। अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के अनेक सदस्य अपने कार्यालय में अथवा कारखाने में अथवा किसी अन्य स्थान पर अत्यन्त परिश्रम करते हैं, और जो कुछ वे कमाते हैं, संघ को दे देते हैं। ऐसी अत्यन्त उन्नत आत्माएँ वस्तुतः संन्यासी हैं और संन्यास-आश्रम में स्थित हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से रूपरेखा दी गई है कि कर्म के फलों का त्याग कैसे किया जाए और किस प्रयोजन हेतु फलों का त्याग किया जाना चाहिए।