अध्याय 18 · 11 / 74
18.11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; देह-भृता—देहधारी के लिए; शक्यम्—सम्भव; त्यक्तुम्—त्यागना; कर्माणि—कर्मों का; अशेषतः—पूर्णतया; यः तु—जो कोई; कर्म—कर्म; फल—फल; त्यागी—त्यागी; सः—वह; त्यागी—त्यागी; इति—इस प्रकार; अभिधीयते—कहा जाता है।
किसी देहधारी प्राणी के लिए समस्त कर्मों का त्याग करना वस्तुतः असम्भव है। अतः कहा जाता है कि जो कर्म के फलों का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति, जो श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के ज्ञान में कर्म करता है, सदा मुक्त रहता है। अतः उसे मृत्यु के पश्चात् अपने कर्मों के फलों का भोग अथवा कष्ट नहीं भोगना पड़ता।