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अध्याय 18 · 16 / 74

18.17

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥

यस्य—जिसका; न—कभी नहीं; अहङ्कृतः—मिथ्या अहंकार; भावः—स्वभाव; बुद्धिः—बुद्धि; यस्य—जिसकी; न—कभी नहीं; लिप्यते—आसक्त होती है; हत्वा अपि—मारकर भी; सः—वह; इमान्—इस; लोकान्—संसार को; न—कभी नहीं; हन्ति—मारता है; न—कभी नहीं; निबध्यते—बँधता है।

जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं होती, वह इस संसार में मनुष्यों का वध करके भी न तो वधकर्ता है और न ही अपने कर्मों से बँधता है।

इस श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि न लड़ने की इच्छा मिथ्या अहंकार से उत्पन्न होती है। अर्जुन स्वयं को कर्म का कर्ता मान रहा था, किन्तु उसने भीतर तथा बाहर की परम अनुमति पर विचार नहीं किया। यदि कोई यह नहीं जानता कि एक परम अनुमति विद्यमान है, तो वह कर्म ही क्यों करे? किन्तु जो कर्म के करण को, कर्ता रूप में स्वयं को, तथा परमेश्वर को परम अनुमति-दाता के रूप में जानता है, वह प्रत्येक कार्य करने में पूर्ण है। ऐसा व्यक्ति कभी मोह में नहीं रहता। वैयक्तिक कर्म तथा उत्तरदायित्व मिथ्या अहंकार एवं ईश्वर-विमुखता, अर्थात् कृष्णभावनामृत के अभाव से उत्पन्न होते हैं। जो कोई परमात्मा अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा है, वह वध करते हुए भी वध नहीं करता। न ही वह कभी ऐसे वध की प्रतिक्रिया से प्रभावित होता है। जब कोई सैनिक किसी उच्चाधिकारी के आदेश पर वध करता है, तो वह दण्ड का पात्र नहीं होता। किन्तु यदि कोई सैनिक अपने वैयक्तिक हेतु से वध करता है, तो वह निश्चय ही न्यायालय द्वारा दण्ड का पात्र होता है।