हि

अध्याय 18 · 15 / 74

18.16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥

तत्र—वहाँ; एवम्—निश्चय ही; सति—होने पर; कर्तारम्—कर्ता; आत्मानम्—आत्मा को; केवलम्—केवल; तु—किन्तु; यः—जो कोई; पश्यति—देखता है; अकृत-बुद्धित्वात्—अल्पबुद्धि के कारण; न—कभी नहीं; सः—वह; पश्यति—देखता है; दुर्मतिः—मूर्ख।

अतः जो इन पाँच कारकों पर विचार न करके स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह निश्चय ही अधिक बुद्धिमान् नहीं है और वस्तुओं को जैसी वे हैं, वैसा नहीं देख सकता।

मूर्ख व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि परमात्मा मित्र रूप में भीतर विराजमान हैं और उसके कर्मों का संचालन कर रहे हैं। यद्यपि भौतिक कारण स्थान, कर्ता, प्रयत्न तथा इन्द्रियाँ हैं, किन्तु अन्तिम कारण परमेश्वर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। अतएव मनुष्य को केवल चार भौतिक कारणों को ही नहीं, अपितु परम निमित्त कारण को भी देखना चाहिए। जो परमेश्वर को नहीं देखता, वह स्वयं को ही करण मान बैठता है।