अध्याय 18 · 18 / 74
18.19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
ज्ञानम्—ज्ञान; कर्म—कर्म; च—भी; कर्ता—कर्ता; च—भी; त्रिधा—तीन प्रकार के; एव—निश्चय ही; गुण-भेदतः—प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार; प्रोच्यते—कहे जाते हैं; गुण-संख्याने—विभिन्न गुणों के अनुसार; यथावत्—जैसे वे कार्य करते हैं; शृणु—सुनो; तानि—उन सबको; अपि—भी।
प्रकृति के तीन गुणों के अनुरूप तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म तथा कर्ता होते हैं। अब मैं उनका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो।
चौदहवें अध्याय में प्रकृति के गुणों के तीन विभागों का विस्तार से वर्णन किया गया था। उस अध्याय में कहा गया था कि सत्त्वगुण प्रकाशमान है, रजोगुण भौतिकतावादी है, और तमोगुण आलस्य तथा प्रमाद को बढ़ाने वाला है। प्रकृति के समस्त गुण बन्धनकारी हैं; वे मुक्ति के स्रोत नहीं हैं। सत्त्वगुण में स्थित होने पर भी मनुष्य बद्ध ही रहता है। सत्रहवें अध्याय में प्रकृति के विभिन्न गुणों में स्थित विभिन्न प्रकार के मनुष्यों द्वारा की जाने वाली विविध प्रकार की पूजा का वर्णन किया गया था। इस श्लोक में भगवान् तीनों भौतिक गुणों के अनुसार विभिन्न प्रकार के ज्ञान, कर्ता तथा कर्म स्वयं के विषय में कहना चाहते हैं।