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अध्याय 18 · 19 / 74

18.20

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥

सर्व-भूतेषु—समस्त जीवों में; येन—जिसके द्वारा; एकम्—एक; भावम्—स्थिति; अव्ययम्—अविनाशी; ईक्षते—देखता है; अविभक्तम्—अविभाजित; विभक्तेषु—असंख्य विभाजितों में; तत्—वह; ज्ञानम्—ज्ञान; विद्धि—जानो; सात्त्विकम्—सत्त्वगुणी।

जिस ज्ञान से मनुष्य समस्त अस्तित्वों में एक अविभाजित आध्यात्मिक प्रकृति को देखता है—विभाजितों में अविभाजित—उसे सत्त्वगुणी ज्ञान जानो।

जो व्यक्ति प्रत्येक जीव में—चाहे वह देवता हो, मनुष्य, पशु, पक्षी, हिंस्र जन्तु, जलचर अथवा वनस्पति हो—एक ही आत्मा को देखता है, वह सत्त्वगुणी ज्ञान से युक्त होता है। समस्त जीवों में एक ही आत्मा विद्यमान है, यद्यपि उनके पूर्व कर्मों के अनुसार उनके शरीर भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसा कि सातवें अध्याय में वर्णित है, प्रत्येक शरीर में जीवन-शक्ति का प्रकटीकरण परमेश्वर की परा प्रकृति के कारण होता है। अतः उस एक परा प्रकृति को, उस जीवन-शक्ति को, प्रत्येक शरीर में देखना ही सत्त्वगुण में देखना है। यद्यपि शरीर नश्वर हैं, वह जीवन-ऊर्जा अविनाशी है। यह भेद शरीर के आधार पर अनुभव होता है, क्योंकि बद्ध जीवन में भौतिक अस्तित्व के अनेक रूप हैं; इसी कारण वे विभाजित प्रतीत होते हैं। ऐसा निर्विशेष ज्ञान अन्ततः आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।