हि

अध्याय 18 · 39 / 74

18.41

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥

brāhmaṇa—ब्राह्मण; kṣatriya—क्षत्रिय; viśām—वैश्य; śūdrāṇām—शूद्र; ca—तथा; parantapa—हे शत्रुओं का दमन करने वाले; karmāṇi—कर्म; pravibhaktāni—विभाजित हैं; svabhāva—अपना स्वभाव; prabhavaiḥ—से उत्पन्न; guṇaiḥ—भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार।

हे शत्रुओं का दमन करने वाले, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रकृति के गुणों के अनुसार अपने कर्म के गुणों से विभाजित किए गए हैं।