हि

अध्याय 18 · 38 / 74

18.40

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥

na—नहीं; tat—वह; asti—है; pṛthivyām—पृथ्वी पर; vā—अथवा; divi—उच्च लोकों में; deveṣu—देवताओं में; vā—अथवा; punaḥ—फिर; sattvam—अस्तित्व; prakṛti-jaiḥ—भौतिक प्रकृति के प्रभाव से; muktam—मुक्त; yat—जो; ebhiḥ—इनसे; syāt—हो; tribhiḥ—तीन; guṇaiḥ—भौतिक प्रकृति के गुणों से।

न तो यहाँ और न ही उच्च लोकों में देवताओं के बीच ऐसा कोई प्राणी है जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से मुक्त हो।

भगवान् यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के समग्र प्रभाव का सारांश प्रस्तुत करते हैं।