अध्याय 18 · 41 / 74
18.43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
śauryam—शौर्य; tejaḥ—तेज; dhṛtiḥ—धृति; dākṣyam—दक्षता; yuddhe—युद्ध में; ca—तथा; api—भी; apalāyanam—पलायन न करना; dānam—दानशीलता; īśvara—नेतृत्व; bhāvaḥ—स्वभाव; ca—तथा; kṣātram—क्षत्रिय का; karma—कर्तव्य; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न।
शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध में साहस, दानशीलता तथा नेतृत्व—ये क्षत्रियों के कर्म के गुण हैं।