अध्याय 18 · 42 / 74
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कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
kṛṣi—कृषि; go—गौ; rakṣya—रक्षा; vāṇijyam—वाणिज्य; vaiśya—वैश्य; karma—कर्तव्य; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न; paricaryā—सेवा; ātmakam—स्वभाव; karma—कर्तव्य; śūdrasya—शूद्र का; api—भी; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न।
कृषि, गौ-रक्षा तथा वाणिज्य वैश्यों के कर्म के गुण हैं, और शूद्रों के लिए श्रम तथा दूसरों की सेवा है।