अध्याय 18 · 47 / 74
18.49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
asakta-buddhiḥ—अनासक्त बुद्धि; sarvatra—सर्वत्र; jita-ātmā—मन पर संयम; vigata-spṛhaḥ—भौतिक इच्छाओं से रहित; naiṣkarmya-siddhim—निष्क्रियता की सिद्धि; paramām—परम; sannyāsena—संन्यास आश्रम के द्वारा; adhigacchati—प्राप्त करता है।
आत्म-संयम के द्वारा तथा भौतिक वस्तुओं से अनासक्त होकर और भौतिक भोगों की उपेक्षा करके मनुष्य त्याग के फलों को प्राप्त कर सकता है। यही त्याग की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है।
वास्तविक त्याग का अर्थ यह है कि मनुष्य को सदा स्वयं को परमेश्वर का अंश-स्वरूप मानना चाहिए। अतः उसे अपने कर्म के फलों का भोग करने का कोई अधिकार नहीं है। चूँकि वह परमेश्वर का अंश-स्वरूप है, अतएव उसके कर्म के फलों का भोग परमेश्वर द्वारा ही होना चाहिए। वस्तुतः यही कृष्णभावनामृत है। कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति वास्तव में संन्यासी है, अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित है। ऐसी मनोवृत्ति से मनुष्य सन्तुष्ट रहता है, क्योंकि वह वास्तव में परम पुरुष के लिए कर्म कर रहा है। इस प्रकार वह किसी भी भौतिक वस्तु में आसक्त नहीं रहता; वह भगवान् की सेवा से प्राप्त दिव्य आनन्द से परे किसी वस्तु में आनन्द न लेने का अभ्यस्त हो जाता है। संन्यासी से यह अपेक्षित है कि वह अपने अतीत के कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो, किन्तु जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में है, वह तथाकथित संन्यास आश्रम को स्वीकार किए बिना ही स्वतः इस सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। मन की इस अवस्था को योगारूढ़, अर्थात् योग की सिद्ध अवस्था कहते हैं, जैसा कि तीसरे अध्याय में पुष्टि की गई है—yas tv ātma-ratir eva syāt। जो स्वयं में सन्तुष्ट है, उसे अपने कर्म से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया का कोई भय नहीं रहता।