हि

अध्याय 18 · 46 / 74

18.48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

saha-jam—साथ-साथ उत्पन्न; karma—कर्म; kaunteya—हे कुन्तीपुत्र; sa-doṣam—दोष सहित; api—यद्यपि; na—कभी नहीं; tyajet—त्यागना चाहिए; sarva-ārambhāḥ—समस्त प्रयास; hi—निश्चय ही; doṣeṇa—दोष से; dhūmena—धूम से; agniḥ—अग्नि; iva—जैसे; āvṛtāḥ—आवृत।

प्रत्येक प्रयास किसी-न-किसी प्रकार के दोष से आवृत होता है, ठीक जैसे अग्नि धूम से आवृत होती है। अतः मनुष्य को अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, हे कुन्तीपुत्र, भले ही ऐसा कर्म दोष से पूर्ण हो।

बद्ध जीवन में समस्त कर्म प्रकृति के भौतिक गुणों से दूषित रहता है। यदि कोई ब्राह्मण भी हो, तो उसे ऐसे यज्ञ सम्पन्न करने पड़ते हैं जिनमें पशु-वध आवश्यक है। इसी प्रकार, क्षत्रिय चाहे कितना ही धर्मनिष्ठ क्यों न हो, उसे शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है। वह इससे बच नहीं सकता। इसी प्रकार, व्यापारी चाहे कितना ही धर्मनिष्ठ क्यों न हो, उसे व्यापार में बने रहने हेतु कभी-कभी अपना लाभ छिपाना पड़ता है, अथवा कभी-कभी उसे चोरबाज़ार में व्यापार करना पड़ता है। ये बातें आवश्यक हैं; मनुष्य इनसे बच नहीं सकता। इसी प्रकार, यद्यपि कोई मनुष्य किसी दुष्ट स्वामी की सेवा करने वाला शूद्र है, फिर भी उसे स्वामी की आज्ञा का पालन करना पड़ता है, भले ही वह करणीय न हो। इन दोषों के होते हुए भी, मनुष्य को अपने विहित कर्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए, क्योंकि वे उसके अपने स्वभाव से उत्पन्न हैं।

यहाँ एक अति उत्तम उदाहरण दिया गया है। यद्यपि अग्नि शुद्ध है, फिर भी धूम रहता है। तथापि धूम अग्नि को अशुद्ध नहीं बनाता। अग्नि में धूम होते हुए भी, अग्नि समस्त तत्त्वों में सर्वाधिक शुद्ध मानी जाती है। यदि कोई क्षत्रिय के कर्म को त्यागकर ब्राह्मण का व्यवसाय अपनाना चाहे, तो यह सुनिश्चित नहीं है कि ब्राह्मण के व्यवसाय में कोई अप्रिय कर्तव्य नहीं हैं। तब मनुष्य यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भौतिक जगत् में कोई भी भौतिक प्रकृति के दूषण से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता। अग्नि तथा धूम का यह उदाहरण इस सन्दर्भ में अत्यन्त उपयुक्त है। शीतकाल में जब कोई अग्नि में से पत्थर निकालता है, तो कभी-कभी धूम नेत्रों तथा शरीर के अन्य अंगों को कष्ट पहुँचाता है, फिर भी मनुष्य को कष्टप्रद परिस्थितियों के होते हुए भी अग्नि का उपयोग करना पड़ता है। इसी प्रकार, मनुष्य को अपने स्वाभाविक व्यवसाय का त्याग केवल इसलिए नहीं करना चाहिए कि उसमें कुछ कष्टप्रद तत्त्व हैं। अपितु, मनुष्य को कृष्णभावनामृत में अपने व्यावसायिक कर्तव्य के द्वारा परमेश्वर की सेवा करने का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यही सिद्धि का बिन्दु है। जब कोई विशिष्ट प्रकार का व्यवसाय परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए सम्पन्न किया जाता है, तब उस विशिष्ट व्यवसाय के समस्त दोष शुद्ध हो जाते हैं। जब कर्म के फल शुद्ध हो जाते हैं, जब वे भक्ति से जुड़ जाते हैं, तब मनुष्य अपने भीतर आत्मा का दर्शन करने में सिद्ध हो जाता है, और यही आत्म-साक्षात्कार है।