हि

अध्याय 18 · 49 / 74

18.51-53

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥

buddhyā—बुद्धि से; viśuddhayā—पूर्णतः शुद्ध; yuktaḥ—संलग्न; dhṛtyā—धृति से; ātmānam—आत्मा को; niyamya—नियमित करके; ca—भी; śabdādīn—शब्द आदि इन्द्रिय-विषय; viṣayān—इन्द्रिय-विषय; tyaktvā—त्यागकर; rāga—आसक्ति; dveṣau—द्वेष; vyudasya—त्यागकर; ca—भी; vivikta-sevī—एकान्त स्थान में निवास करता हुआ; laghu-āśī—अल्प भोजन करता हुआ; yata-vāk—वाणी का संयम; kāya—शरीर; mānasaḥ—मन का संयम; dhyāna-yoga-paraḥ—सदा समाधि में लीन; nityam—चौबीसों घंटे; vairāgyam—वैराग्य; samupāśritaḥ—आश्रय लिए हुए; ahaṅkāram—मिथ्या अहंकार; balam—मिथ्या बल; darpam—मिथ्या दर्प; kāmam—काम; krodham—क्रोध; parigraham—भौतिक वस्तुओं का परिग्रह; vimucya—मुक्त होकर; nirmamaḥ—ममत्व से रहित; śāntaḥ—शान्त; brahma-bhūyāya—आत्म-साक्षात्कार हेतु; kalpate—योग्य हो जाता है।

जो अपनी बुद्धि से शुद्ध होकर तथा धृति से मन को संयमित करते हुए, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्यागकर, आसक्ति तथा द्वेष से मुक्त होकर, एकान्त स्थान में निवास करता है, जो अल्प भोजन करता है और जो शरीर तथा वाणी पर संयम रखता है, और जो सदा समाधि में रहता है तथा विरक्त है, जो मिथ्या अहंकार, मिथ्या बल, मिथ्या दर्प, काम, क्रोध से रहित है, और जो भौतिक वस्तुओं को स्वीकार नहीं करता—ऐसा व्यक्ति निश्चय ही आत्म-साक्षात्कार की अवस्था तक उन्नत होता है।

जब मनुष्य ज्ञान से शुद्ध हो जाता है, तब वह स्वयं को सत्त्वगुण में स्थित रखता है। इस प्रकार वह मन का नियन्ता बन जाता है और सदा समाधि में रहता है। चूँकि वह इन्द्रियतृप्ति के विषयों में आसक्त नहीं है, अतः वह अपनी आवश्यकता से अधिक भोजन नहीं करता, और वह अपने शरीर तथा मन की क्रियाओं पर संयम रखता है। उसमें मिथ्या अहंकार नहीं रहता, क्योंकि वह शरीर को आत्मा के रूप में स्वीकार नहीं करता। न ही उसमें अनेक भौतिक वस्तुओं को स्वीकार करके शरीर को पुष्ट तथा बलवान् बनाने की इच्छा रहती है। चूँकि उसमें जीवन की देहात्म-बुद्धि नहीं है, अतएव वह मिथ्या दर्प से युक्त नहीं होता। भगवान् की कृपा से जो कुछ उसे अर्पित होता है, उसी से वह सन्तुष्ट रहता है, और इन्द्रियतृप्ति के अभाव में वह कभी क्रोधित नहीं होता। न ही वह इन्द्रिय-विषयों को अर्जित करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार जब वह मिथ्या अहंकार से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, तब वह समस्त भौतिक वस्तुओं के प्रति अनासक्त हो जाता है, और यही ब्रह्म के आत्म-साक्षात्कार की अवस्था है। उस अवस्था को ब्रह्म-भूत अवस्था कहते हैं। जब मनुष्य जीवन की भौतिक धारणा से मुक्त हो जाता है, तब वह शान्त हो जाता है और विचलित नहीं किया जा सकता।