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अध्याय 18 · 50 / 74

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ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥

brahma-bhūtaḥ—परम सत्य के साथ एकीभूत; prasanna-ātmā—पूर्णतः आनन्दित; na—कभी नहीं; śocati—शोक करता है; na—कभी नहीं; kāṅkṣati—इच्छा करता है; samaḥ—समभाव; sarveṣu—समस्त; bhūteṣu—जीवों के प्रति; mat-bhaktim—मेरी भक्ति; labhate—प्राप्त करता है; parām—दिव्य।

जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित है, वह तुरन्त परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है, न ही किसी वस्तु की इच्छा करता है; वह समस्त जीवों के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है।

निर्विशेषवादी के लिए ब्रह्म-भूत अवस्था को प्राप्त करना, अर्थात् परम सत्य के साथ एकीभूत हो जाना, अन्तिम लक्ष्य है। किन्तु साकारवादी, अर्थात् शुद्ध भक्त के लिए, मनुष्य को शुद्ध भक्ति में संलग्न होने हेतु और भी आगे जाना पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की शुद्ध भक्ति में संलग्न है, वह पहले से ही मुक्ति की अवस्था में है, जिसे ब्रह्म-भूत, अर्थात् परम सत्य के साथ एकत्व कहते हैं। परम सत्य के साथ एकीभूत हुए बिना मनुष्य उनकी सेवा नहीं कर सकता। परम धारणा में सेव्य तथा सेवक में कोई भेद नहीं है; फिर भी उच्चतर आध्यात्मिक अर्थ में वह भेद विद्यमान है।

जीवन की भौतिक धारणा में, जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करता है, तब दुःख होता है, किन्तु परम जगत् में, जब मनुष्य शुद्ध भक्ति में संलग्न रहता है, तब कोई दुःख नहीं होता। कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त के पास न शोक करने को कुछ है, न इच्छा करने को। चूँकि ईश्वर पूर्ण हैं, अतः जो जीव ईश्वर की सेवा में, कृष्णभावनामृत में संलग्न है, वह भी स्वयं में पूर्ण हो जाता है। वह उस नदी के समान है जो समस्त मलिन जल से स्वच्छ कर दी गई हो। चूँकि शुद्ध भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नहीं रहता, अतएव वह स्वाभाविक रूप से सदा आनन्दित रहता है। वह किसी भौतिक हानि अथवा लाभ हेतु शोक नहीं करता, क्योंकि वह भगवान् की सेवा में पूर्ण है। उसे भौतिक भोग की कोई इच्छा नहीं रहती, क्योंकि वह जानता है कि प्रत्येक जीव परमेश्वर का अंश-स्वरूप है और अतएव नित्य सेवक है। वह भौतिक जगत् में किसी को उच्च तथा किसी को निम्न नहीं देखता; उच्च तथा निम्न पद क्षणिक हैं, और भक्त का क्षणिक उद्भव अथवा विनाश से कोई सरोकार नहीं रहता। उसके लिए पत्थर तथा स्वर्ण का समान मूल्य है। यही ब्रह्म-भूत अवस्था है, और यह अवस्था शुद्ध भक्त के द्वारा अत्यन्त सरलता से प्राप्त की जाती है। अस्तित्व की उस अवस्था में, परब्रह्म के साथ एकीभूत होकर अपनी व्यष्टि का विनाश कर देने का विचार नारकीय प्रतीत होने लगता है, और स्वर्गलोक की प्राप्ति का विचार मायाजाल प्रतीत होने लगता है, और इन्द्रियाँ टूटे हुए सर्पों के दाँतों के समान हो जाती हैं। जैसे टूटे दाँतों वाले सर्प का कोई भय नहीं रहता, वैसे ही जब इन्द्रियाँ स्वतः वश में हो जाती हैं, तब उनसे कोई भय नहीं रहता। भौतिक रूप से संक्रमित व्यक्ति के लिए यह संसार दुःखमय है, किन्तु भक्त के लिए सम्पूर्ण संसार वैकुण्ठ, अर्थात् आध्यात्मिक आकाश के समान ही है। इस भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च व्यक्ति भी भक्त के लिए एक चींटी से अधिक महत्त्व नहीं रखता। ऐसी अवस्था भगवान् चैतन्य की कृपा से प्राप्त की जा सकती है, जिन्होंने इस युग में शुद्ध भक्ति का प्रचार किया।