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अध्याय 18 · 72 / 74

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राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥

राजन्—हे राजन्; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; संवादम्—संवाद को; इमम्—इस; अद्भुतम्—अद्भुत; केशव—भगवान् श्रीकृष्ण; अर्जुनयोः—तथा अर्जुन का; पुण्यम्—पवित्र; हृष्यामि—आनन्द लेता हूँ; च—भी; मुहुः मुहुः—बारम्बार, पुनः-पुनः।

हे राजन्, जैसे-जैसे मैं श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के इस अद्भुत तथा पवित्र संवाद का बारम्बार स्मरण करता हूँ, वैसे-वैसे मैं प्रति क्षण रोमांचित होकर आनन्द का अनुभव करता हूँ।

भगवद्गीता की समझ इतनी दिव्य है कि जो कोई अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के विषयों से सुपरिचित हो जाता है, वह धर्मात्मा बन जाता है, और वह ऐसी वार्ताओं को कभी नहीं भुला सकता। यही आध्यात्मिक जीवन की दिव्य स्थिति है। दूसरे शब्दों में, जो गीता को सही स्रोत से, साक्षात् श्रीकृष्ण से सुनता है, वह पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त कर लेता है। कृष्णभावनामृत का परिणाम यह है कि मनुष्य उत्तरोत्तर प्रबुद्ध होता जाता है, और वह जीवन का आनन्द रोमांच के साथ लेता है, केवल कुछ समय के लिए ही नहीं, अपितु प्रति क्षण।