हि

अध्याय 18 · 71 / 74

18.75

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥

व्यास-प्रसादात्—व्यासदेव की कृपा से; श्रुतवान्—सुना; एतत्—यह; गुह्यम्—गोपनीय; अहम्—मैंने; परम्—परम; योगम्—योग; योगेश्वरात्—समस्त योग के स्वामी से; कृष्णात्—श्रीकृष्ण से; साक्षात्—साक्षात्; कथयतः—कहते हुए; स्वयम्—स्वयं।

व्यास की कृपा से मैंने ये परम गोपनीय वार्ताएँ साक्षात् समस्त योग के स्वामी श्रीकृष्ण से सुनीं, जो स्वयं अर्जुन से बात कर रहे थे।

व्यास सञ्जय के आध्यात्मिक गुरु थे, और सञ्जय स्वीकार करता है कि उन्हीं की कृपा से वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझ सका। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से नहीं, अपितु आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से समझना होता है। आध्यात्मिक गुरु पारदर्शी माध्यम हैं, यद्यपि यह सत्य है कि अनुभव प्रत्यक्ष होता है। गुरु-परम्परा का यही रहस्य है। जब आध्यात्मिक गुरु प्रामाणिक होते हैं, तब मनुष्य भगवद्गीता को प्रत्यक्ष रूप से सुन सकता है, जैसे अर्जुन ने सुना। समूचे संसार में अनेक योगी तथा योगाभ्यासी हैं, किन्तु श्रीकृष्ण समस्त योग-पद्धतियों के स्वामी हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है—श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करो। जो ऐसा करता है, वही सर्वोच्च योगी है। इसकी पुष्टि छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक में होती है—योगिनाम् अपि सर्वेषाम्।

नारद श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य तथा व्यास के आध्यात्मिक गुरु हैं। अतः व्यास उतने ही प्रामाणिक हैं जितना अर्जुन, क्योंकि वे गुरु-परम्परा में आते हैं, और सञ्जय व्यास का प्रत्यक्ष शिष्य है। अतएव व्यास की कृपा से उसकी इन्द्रियाँ शुद्ध हो गईं, और वह श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से देख तथा सुन सका। जो श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनता है, वह इस गोपनीय ज्ञान को समझ सकता है। यदि कोई गुरु-परम्परा में नहीं आता, तो वह श्रीकृष्ण को नहीं सुन सकता; फलतः उसका ज्ञान सदैव अपूर्ण रहता है, कम-से-कम भगवद्गीता की समझ के सम्बन्ध में।

भगवद्गीता में समस्त योग-पद्धतियाँ—कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—समझाई गई हैं। श्रीकृष्ण ऐसे समस्त योग के स्वामी हैं। किन्तु यह समझना चाहिए कि जैसे अर्जुन इतना सौभाग्यशाली था कि उसने श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से समझा, उसी प्रकार व्यास की कृपा से सञ्जय भी श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनने में समर्थ हुआ। वास्तव में श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप से सुनने में अथवा व्यास जैसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनने में कोई अन्तर नहीं है। आध्यात्मिक गुरु व्यासदेव के भी प्रतिनिधि हैं। वैदिक पद्धति के अनुसार, आध्यात्मिक गुरु के जन्मदिवस पर शिष्य व्यास-पूजा नामक समारोह सम्पन्न करते हैं।