अध्याय 18 · 8 / 74
18.8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
दुःखम्—दुःखमय; इति—इस प्रकार; एव—निश्चय ही; यत्—जो; कर्म—कर्म; काय—शरीर; क्लेश—कष्टप्रद; भयात्—भय के कारण; त्यजेत्—त्याग दे; सः—वह; कृत्वा—करके; राजसम्—रजोगुण में; त्यागम्—त्याग; न एव—निश्चय ही नहीं; त्याग—त्याग के; फलम्—फल; लभेत्—प्राप्त करता है।
जो कोई विहित कर्तव्यों को कष्टप्रद समझकर अथवा भय के कारण त्याग देता है, वह रजोगुणी कहा जाता है। ऐसा कर्म कभी भी त्याग की उन्नति की ओर नहीं ले जाता।
जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसे इस भय से धन कमाना नहीं छोड़ना चाहिए कि वह सकाम कर्म कर रहा है। यदि कोई कर्म करके अपने धन को कृष्णभावनामृत में लगा सकता है, अथवा प्रातःकाल जल्दी उठकर अपनी दिव्य कृष्णभावनामृत में उन्नति कर सकता है, तो उसे भय के कारण अथवा इसलिए कि ऐसे कर्म कष्टप्रद माने जाते हैं, उनसे विरत नहीं होना चाहिए। ऐसा त्याग रजोगुण में होता है। राजसी कर्म का फल सदा दुःखमय होता है। यदि कोई व्यक्ति उसी भाव से कर्म का त्याग कर देता है, तो उसे त्याग का फल कभी नहीं मिलता।