अध्याय 18 · 7 / 74
18.7
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
नियतस्य—विहित कर्तव्यों का; तु—किन्तु; संन्यासः—संन्यास; कर्मणः—कर्मों का; न—कभी नहीं; उपपद्यते—उचित है; मोहात्—मोह के कारण; तस्य—जिसका; परित्यागः—त्याग; तामसः—तमोगुण में; परिकीर्तितः—घोषित।
विहित कर्तव्यों का कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई मोहवश अपने विहित कर्तव्यों का त्याग कर देता है, तो ऐसा त्याग तमोगुणी कहा जाता है।
भौतिक तृप्ति हेतु किए जाने वाले कर्म का त्याग कर देना चाहिए, किन्तु जो कर्म मनुष्य को आध्यात्मिक कर्म की ओर अग्रसर करते हैं—जैसे परमेश्वर के लिए भोजन पकाना तथा वह भोजन भगवान् को अर्पित करके फिर ग्रहण करना—उनकी अनुशंसा की जाती है। कहा जाता है कि संन्यास-आश्रम में स्थित व्यक्ति को अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए। अपने लिए भोजन पकाना निषिद्ध है, किन्तु परमेश्वर के लिए भोजन पकाना निषिद्ध नहीं है। इसी प्रकार, कोई संन्यासी अपने शिष्य को कृष्णभावनामृत में उन्नति हेतु सहायता देने के लिए विवाह-संस्कार सम्पन्न करा सकता है। यदि कोई ऐसे कर्मों का त्याग करता है, तो यह समझना चाहिए कि वह तमोगुण में कर्म कर रहा है।