हि

अध्याय 2 · 1 / 71

2.1

सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥

सञ्जयः उवाच—सञ्जय ने कहा; तम्—अर्जुन से; तथा—इस प्रकार; कृपया—करुणा से; आविष्टम्—अभिभूत; अश्रु-पूर्ण—अश्रुओं से भरे; आकुल—खिन्न; ईक्षणम्—नेत्र; विषीदन्तम्—शोक करते हुए; इदम्—यह; वाक्यम्—वचन; उवाच—कहा; मधुसूदनः—मधु के संहारक ने।

सञ्जय ने कहा : अर्जुन को करुणा से व्याकुल तथा अत्यन्त शोकाकुल देखकर, जिनके नेत्र अश्रुओं से भरे हुए थे, मधुसूदन श्रीकृष्ण ने निम्नलिखित वचन कहे।

भौतिक करुणा, शोक तथा अश्रु—ये सब वास्तविक आत्मा के विषय में अज्ञान के लक्षण हैं। नित्य आत्मा के प्रति करुणा ही आत्म-साक्षात्कार है। इस श्लोक में “मधुसूदन” शब्द सार्थक है। भगवान् श्रीकृष्ण ने मधु नामक असुर का वध किया था, और अब अर्जुन चाहते थे कि श्रीकृष्ण उस मोहरूपी असुर का वध करें, जिसने उन्हें अपने कर्तव्य के पालन में आ घेरा था। कोई नहीं जानता कि करुणा कहाँ प्रयुक्त होनी चाहिए। डूबते हुए मनुष्य के वस्त्र के प्रति करुणा निरर्थक है। अज्ञान के समुद्र में गिरा हुआ मनुष्य केवल अपने बाह्य वस्त्र—स्थूल भौतिक शरीर—की रक्षा करने मात्र से नहीं बचाया जा सकता। जो यह नहीं जानता और बाह्य वस्त्र के लिए शोक करता है, उसे शूद्र कहा जाता है, अर्थात् वह जो अनावश्यक रूप से शोक करता है। अर्जुन क्षत्रिय थे, और उनसे ऐसे आचरण की अपेक्षा नहीं थी। तथापि भगवान् श्रीकृष्ण अज्ञानी मनुष्य के शोक को दूर कर सकते हैं, और इसी प्रयोजन से उन्होंने भगवद्गीता का गान किया। यह अध्याय हमें आत्म-साक्षात्कार की शिक्षा देता है, जिसमें भौतिक शरीर तथा आत्मा का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है, जैसा कि परम प्रमाण भगवान् श्रीकृष्ण ने समझाया है। यह अनुभूति वास्तविक आत्मा की सुदृढ़ धारणा में स्थित होकर सकाम सत्ता के साथ कर्म करने से सम्भव होती है।