अध्याय 1 · 39 / 39
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सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४६ ॥
sañjayaḥ—सञ्जय; uvāca—ने कहा; evam—इस प्रकार; uktvā—कहकर; arjunaḥ—अर्जुन; saṅkhye—युद्धभूमि में; ratha—रथ; upasthaḥ—पर स्थित; upāviśat—पुनः बैठ गया; visṛjya—एक ओर रखकर; sa-śaram—बाणों सहित; cāpam—धनुष; śoka—शोक; saṁvigna—विचलित; mānasaḥ—मन के भीतर।
सञ्जय ने कहा: इस प्रकार युद्धभूमि में कहकर अर्जुन ने अपना धनुष-बाण एक ओर रख दिया और रथ पर बैठ गया, उसका मन शोक से अभिभूत था।
शत्रु की स्थिति का अवलोकन करते हुए अर्जुन रथ पर खड़ा हुआ, किन्तु वह शोक से इतना पीड़ित था कि अपने धनुष-बाण को एक ओर रखकर पुनः बैठ गया। ऐसा दयालु तथा कोमल हृदय व्यक्ति, भगवान् की भक्ति में संलग्न, आत्मज्ञान प्राप्त करने के योग्य होता है।
इस प्रकार कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में सेनावलोकन के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।