अध्याय 2 · 3 / 71
2.3
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
क्लैब्यम्—नपुंसकता; मा—मत; स्म—ग्रहण करो; गमः—जाओ; पार्थ—हे पृथापुत्र; न—कभी नहीं; एतत्—इस प्रकार; त्वयि—तुम्हें; उपपद्यते—शोभा देता है; क्षुद्रम्—अत्यन्त तुच्छ; हृदय—हृदय; दौर्बल्यम्—दुर्बलता; त्यक्त्वा—त्यागकर; उत्तिष्ठ—उठो; परन्तप—हे शत्रुओं का दमन करने वाले।
हे पृथापुत्र, इस अधोगामी नपुंसकता के वशीभूत मत होओ। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की ऐसी तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठो, हे शत्रुओं का दमन करने वाले।
अर्जुन को “पृथापुत्र” कहकर सम्बोधित किया गया, जो श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहिन थीं। अतः अर्जुन का श्रीकृष्ण से रक्त-सम्बन्ध था। यदि किसी क्षत्रिय का पुत्र युद्ध करने से इन्कार करता है, तो वह नाममात्र का क्षत्रिय है, और यदि किसी ब्राह्मण का पुत्र अधर्मपूर्ण आचरण करता है, तो वह नाममात्र का ब्राह्मण है। ऐसे क्षत्रिय तथा ब्राह्मण अपने पिताओं के अयोग्य पुत्र हैं; अतः श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि अर्जुन किसी क्षत्रिय का अयोग्य पुत्र बनें। अर्जुन श्रीकृष्ण के सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र थे, और श्रीकृष्ण रथ पर साक्षात् उनका मार्गदर्शन कर रहे थे; किन्तु इन समस्त श्रेयों के होते हुए भी, यदि अर्जुन युद्ध त्याग देते, तो वे एक अपयशकारी कृत्य करते; अतएव श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन में ऐसी मनोवृत्ति उनके व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं है। अर्जुन यह तर्क दे सकते थे कि वे सर्वाधिक आदरणीय भीष्म तथा अपने सम्बन्धियों के प्रति उदार मनोवृत्ति के कारण युद्ध त्याग देंगे, किन्तु श्रीकृष्ण ने उस प्रकार की उदारता को प्रमाण-सम्मत नहीं माना। फलतः ऐसी उदारता अथवा तथाकथित अहिंसा को अर्जुन जैसे व्यक्तियों द्वारा श्रीकृष्ण के साक्षात् मार्गदर्शन में त्याग देना चाहिए।