अध्याय 2 · 4 / 71
2.4
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; कथम्—कैसे; भीष्मम्—भीष्म पर; अहम्—मैं; सङ्ख्ये—युद्ध में; द्रोणम्—द्रोण पर; च—भी, मधुसूदन—हे मधु के संहारक; इषुभिः—बाणों से; प्रतियोत्स्यामि—प्रत्याक्रमण करूँगा; पूजा-अर्हौ—जो पूजनीय हैं; अरिसूदन—हे शत्रुओं के संहारक।
अर्जुन ने कहा : हे मधु के संहारक [श्रीकृष्ण], मैं युद्ध में भीष्म तथा द्रोण जैसे पुरुषों पर, जो मेरे पूजनीय हैं, बाणों से किस प्रकार प्रत्याक्रमण कर सकता हूँ?
पितामह भीष्म तथा आचार्य द्रोण जैसे आदरणीय गुरुजन सदैव पूजनीय हैं। यदि वे आक्रमण भी करें, तब भी उन पर प्रत्याक्रमण नहीं करना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है कि गुरुजनों को वाक्-युद्ध तक नहीं देना चाहिए। यदि वे कभी आचरण में कठोर भी हों, तब भी उनके साथ कठोरता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। तो फिर अर्जुन के लिए उन पर प्रत्याक्रमण करना कैसे सम्भव है? क्या श्रीकृष्ण कभी अपने पितामह उग्रसेन अथवा अपने गुरु सान्दीपनि मुनि पर आक्रमण करते? ये अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण के समक्ष रखे गए कुछ तर्क थे।