अध्याय 2 · 69 / 71
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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
āpūryamāṇam—सदा परिपूर्ण; acala-pratiṣṭham—स्थिरतापूर्वक स्थित; samudram—समुद्र; āpaḥ—जल; praviśanti—प्रवेश करते हैं; yadvat—जिस प्रकार; tadvat—उसी प्रकार; kāmāḥ—इच्छाएँ; yam—जिसमें; praviśanti—प्रवेश करती हैं; sarve—समस्त; saḥ—वह व्यक्ति; śāntim—शान्ति; āpnoti—प्राप्त करता है; na—नहीं; kāma-kāmī—जो इच्छाओं की पूर्ति की कामना करता है।
जो व्यक्ति इच्छाओं के निरन्तर प्रवाह से विचलित नहीं होता—जो उस समुद्र में नदियों के समान प्रवेश करती हैं, जो सदा भरता रहता है किन्तु सदा अचल रहता है—वही शान्ति प्राप्त कर सकता है, वह मनुष्य नहीं जो ऐसी इच्छाओं की तृप्ति का प्रयत्न करता है।
यद्यपि विशाल समुद्र सदा जल से परिपूर्ण रहता है, फिर भी वह सदा, विशेषकर वर्षा-ऋतु में, और भी अधिक जल से भरता रहता है। किन्तु समुद्र वैसा-का-वैसा ही रहता है—स्थिर; वह न तो उद्वेलित होता है और न अपने तट की सीमा को लाँघता है। यही बात कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति पर भी लागू होती है। जब तक मनुष्य का भौतिक शरीर है, तब तक इन्द्रियतृप्ति हेतु शरीर की माँगें बनी रहेंगी। किन्तु भक्त अपनी पूर्णता के कारण ऐसी इच्छाओं से विचलित नहीं होता। कृष्णभावनाभावित मनुष्य को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि भगवान् उसकी समस्त भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। अतः वह समुद्र के समान है—स्वयं में सदा परिपूर्ण। इच्छाएँ उसके पास उन नदियों के जल के समान आ सकती हैं, जो समुद्र में प्रवाहित होती हैं, किन्तु वह अपनी क्रियाओं में स्थिर रहता है, और इन्द्रियतृप्ति की इच्छाओं से तनिक भी विचलित नहीं होता। यही कृष्णभावनाभावित मनुष्य का प्रमाण है—जिसने भौतिक इन्द्रियतृप्ति की समस्त प्रवृत्तियाँ खो दी हैं, यद्यपि इच्छाएँ विद्यमान हैं। चूँकि वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में सन्तुष्ट रहता है, अतः वह समुद्र के समान स्थिर रह सकता है और इस प्रकार पूर्ण शान्ति का आनन्द लेता है। किन्तु अन्य लोग, जो मोक्ष की सीमा तक भी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं—भौतिक सफलता की तो बात ही क्या—कभी शान्ति प्राप्त नहीं करते। सकाम कर्मी, मोक्षवादी, तथा सिद्धियों के पीछे भागने वाले योगी भी—सभी अपनी अतृप्त इच्छाओं के कारण दुखी रहते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति भगवान् की सेवा में सुखी रहता है, और उसकी कोई इच्छा पूर्ति के लिए शेष नहीं रहती। वस्तुतः वह तथाकथित भौतिक बन्धन से मुक्ति की भी कामना नहीं करता। श्रीकृष्ण के भक्तों में कोई भौतिक इच्छा नहीं होती, अतएव वे पूर्ण शान्ति में रहते हैं।