अध्याय 2 · 68 / 71
2.69
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
yā—जो; niśā—रात्रि है; sarva—समस्त; bhūtānām—जीवों की; tasyām—उसमें; jāgarti—जागृत; saṁyamī—आत्मसंयमी; yasyām—जिसमें; jāgrati—जागते हैं; bhūtāni—समस्त प्राणी; sā—वह है; niśā—रात्रि; paśyataḥ—अन्तर्दर्शी के लिए; muneḥ—मुनि।
जो समस्त प्राणियों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के लिए जागरण का समय है; और जो समस्त प्राणियों के लिए जागरण का समय है, वह अन्तर्दर्शी मुनि के लिए रात्रि है।
बुद्धिमान् मनुष्यों के दो वर्ग हैं। एक इन्द्रियतृप्ति हेतु भौतिक क्रियाओं में बुद्धिमान् है, और दूसरा अन्तर्दर्शी है तथा आत्म-साक्षात्कार के अनुशीलन के प्रति जागृत है। अन्तर्दर्शी मुनि अथवा विचारशील मनुष्य की क्रियाएँ भौतिकता में लीन व्यक्तियों के लिए रात्रि के समान हैं। भौतिकतावादी व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार के विषय में अज्ञान के कारण ऐसी रात्रि में सोते रहते हैं। अन्तर्दर्शी मुनि भौतिकतावादी मनुष्यों की “रात्रि” में सतर्क रहता है। मुनि आध्यात्मिक संस्कृति की क्रमिक उन्नति में दिव्य आनन्द का अनुभव करता है, जबकि भौतिकतावादी क्रियाओं में रत मनुष्य, आत्म-साक्षात्कार के प्रति सोया हुआ होने के कारण, विविध प्रकार के इन्द्रिय-सुख का स्वप्न देखता है, और अपनी सुप्त अवस्था में कभी सुखी तो कभी दुखी अनुभव करता है। अन्तर्दर्शी मनुष्य सदा भौतिक सुख-दुःख के प्रति उदासीन रहता है। वह भौतिक प्रतिक्रिया से अविचलित रहकर अपनी आत्म-साक्षात्कार की क्रियाओं को आगे बढ़ाता रहता है।