अध्याय 2 · 71 / 71
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एषा ब्राह्मी स्थितिःपार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
eṣā—यह; brāhmī—आध्यात्मिक; sthitiḥ—स्थिति; pārtha—हे पृथापुत्र; na—कभी नहीं; enām—इसे; prāpya—प्राप्त करके; vimuhyati—मोहित होता है; sthitvā—इस प्रकार स्थित होकर; asyām—इसमें स्थित होते हुए; anta-kāle—जीवन के अन्तकाल में; api—भी; brahma-nirvāṇam—आध्यात्मिक (ईश्वर का राज्य); ṛcchati—प्राप्त करता है।
यही आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय जीवन का मार्ग है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। इस प्रकार स्थित होकर, मृत्यु के समय भी, मनुष्य ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है।
मनुष्य कृष्णभावनामृत अथवा दिव्य जीवन तत्क्षण, एक ही क्षण में प्राप्त कर सकता है—अथवा करोड़ों जन्मों के पश्चात् भी ऐसी जीवन-स्थिति को प्राप्त न कर सके। यह केवल इस तथ्य को समझने और स्वीकार करने का विषय है। खट्वाङ्ग महाराज ने श्रीकृष्ण की शरण में जाकर अपनी मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व इस जीवन-स्थिति को प्राप्त कर लिया। निर्वाण का अर्थ है भौतिकतावादी जीवन की प्रक्रिया का अन्त। बौद्ध दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन की समाप्ति के पश्चात् केवल शून्य रह जाता है, किन्तु भगवद्गीता इससे भिन्न शिक्षा देती है। वास्तविक जीवन तो इस भौतिक जीवन की समाप्ति के पश्चात् आरम्भ होता है। स्थूल भौतिकतावादी के लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि उसे इस भौतिकतावादी जीवनशैली का अन्त करना है, किन्तु जो आध्यात्मिक रूप से उन्नत हैं, उनके लिए इस भौतिकतावादी जीवन के पश्चात् एक अन्य जीवन है। इस जीवन के समाप्त होने से पूर्व यदि कोई सौभाग्यवश कृष्णभावनाभावित हो जाए, तो वह तत्क्षण ब्रह्म-निर्वाण की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। ईश्वर के राज्य और भगवान् की भक्ति में कोई भेद नहीं है। चूँकि ये दोनों परम धरातल पर स्थित हैं, अतः भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होना ही आध्यात्मिक राज्य को प्राप्त कर लेना है। भौतिक जगत् में इन्द्रियतृप्ति की क्रियाएँ होती हैं, जबकि आध्यात्मिक जगत् में कृष्णभावनामृत की क्रियाएँ होती हैं। इस जीवन में भी कृष्णभावनामृत की प्राप्ति ब्रह्म की तत्काल प्राप्ति है, और जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसने निश्चय ही ईश्वर के राज्य में पहले से ही प्रवेश कर लिया है।
ब्रह्म पदार्थ का ठीक विपरीत है। अतः brāhmī sthitiḥ का अर्थ है “भौतिक क्रियाओं के धरातल पर नहीं”। भगवद्गीता में भगवान् की भक्ति को मुक्त अवस्था के रूप में स्वीकार किया गया है। इसी कारण brāhmī-sthitiḥ भौतिक बन्धन से मुक्ति है।
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने भगवद्गीता के इस द्वितीय अध्याय को सम्पूर्ण ग्रन्थ की विषय-वस्तु के रूप में संक्षिप्त किया है। भगवद्गीता में कर्म-योग, ज्ञान-योग और भक्ति-योग प्रतिपाद्य विषय हैं। द्वितीय अध्याय में कर्म-योग तथा ज्ञान-योग का स्पष्ट विवेचन हुआ है, और सम्पूर्ण ग्रन्थ की विषय-वस्तु के रूप में भक्ति-योग की एक झलक भी प्रदान की गई है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय की विषय-वस्तु के सम्बन्ध में भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।