अध्याय 3 · 10 / 43
3.10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
सह—सहित; यज्ञाः—यज्ञ; प्रजाः—सन्तानें; सृष्ट्वा—सृष्टि करके; पुरा—प्राचीन काल में; उवाच—कहा; प्रजा-पतिः—जीवों के स्वामी ने; अनेन—इसके द्वारा; प्रसविष्यध्वम्—अधिकाधिक समृद्ध हो जाओ; एषः—निश्चय ही; वः—तुम्हारा; अस्तु—हो; इष्ट—समस्त वांछनीय; काम-धुक्—प्रदान करने वाला।
सृष्टि के आरम्भ में, समस्त जीवों के स्वामी ने मनुष्यों एवं देवताओं की सन्तानों को विष्णु के लिए यज्ञों सहित उत्पन्न किया, और यह कहकर उन्हें आशीर्वाद दिया, “तुम इस यज्ञ के द्वारा सुखी होओ, क्योंकि इसका अनुष्ठान तुम्हें समस्त वांछनीय वस्तुएँ प्रदान करेगा।”
जीवों के स्वामी (विष्णु) द्वारा की गई भौतिक सृष्टि बद्धजीवों को भगवद्धाम लौटने—भगवान् के पास वापस जाने—का अवसर प्रदान करती है। भौतिक सृष्टि के भीतर समस्त जीव श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाने के कारण भौतिक प्रकृति से बद्ध हैं। वैदिक सिद्धान्त हमें इस नित्य सम्बन्ध को समझने में सहायता करने हेतु हैं, जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है: वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः। भगवान् कहते हैं कि वेदों का प्रयोजन उन्हें समझना है। वैदिक स्तुतियों में कहा गया है: पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्। अतः जीवों के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं। श्रीमद्भागवत में भी श्रील शुकदेव गोस्वामी भगवान् को अनेक प्रकार से पति के रूप में वर्णित करते हैं:
श्रियः पतिर्यज्ञपतिः प्रजापतिर्
धियां पतिर्लोकपतिर्धरापतिः ।
पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां
प्रसीदतां मे भगवान्सतां पतिः ॥
(भा. 2.4.20)
प्रजा-पति भगवान् विष्णु हैं, और वे समस्त जीवों, समस्त लोकों तथा समस्त सौन्दर्यों के स्वामी एवं सबके रक्षक हैं। भगवान् ने यह भौतिक जगत् बद्धजीवों के लिए इसलिए रचा कि वे विष्णु की प्रसन्नता हेतु यज्ञ (अनुष्ठान) करना सीखें, ताकि भौतिक जगत् में रहते हुए वे बिना किसी चिन्ता के अत्यन्त सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें। तत्पश्चात् वर्तमान भौतिक शरीर को समाप्त करके वे भगवद्धाम में प्रवेश कर सकें। बद्धजीव के लिए यही समूची योजना है। यज्ञ के अनुष्ठान के द्वारा बद्धजीव क्रमशः कृष्णभावनाभावित हो जाते हैं और सर्वथा ईश्वर-परायण बन जाते हैं। इस कलियुग में, संकीर्तन-यज्ञ (भगवान् के नामों का कीर्तन) की अनुशंसा वैदिक शास्त्रों द्वारा की गई है, और इस दिव्य प्रणाली का प्रवर्तन भगवान् चैतन्य ने इस युग के समस्त मनुष्यों के उद्धार हेतु किया। संकीर्तन-यज्ञ तथा कृष्णभावनामृत भली-भाँति एक साथ चलते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्त-रूप में (भगवान् चैतन्य के रूप में) श्रीमद्भागवत में इस प्रकार वर्णित हैं, विशेष रूप से संकीर्तन-यज्ञ के सन्दर्भ में:
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् ।
यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥
“इस कलियुग में, पर्याप्त बुद्धि से सम्पन्न लोग भगवान् की, जो अपने पार्षदों सहित हैं, संकीर्तन-यज्ञ के अनुष्ठान के द्वारा आराधना करेंगे।” (भा. 11.5.29) वैदिक साहित्य में विहित अन्य यज्ञ इस कलियुग में सम्पन्न करना सरल नहीं, किन्तु संकीर्तन-यज्ञ समस्त प्रयोजनों के लिए सरल एवं उदात्त है।