हि

अध्याय 3 · 9 / 43

3.9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥

यज्ञ-अर्थात्—केवल यज्ञ अर्थात् विष्णु के निमित्त; कर्मणः—किया गया कर्म; अन्यत्र—अन्यथा; लोकः—यह जगत्; अयम्—यह; कर्म-बन्धनः—कर्म से बन्धन; तत्—उनके; अर्थम्—निमित्त; कर्म—कर्म; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; मुक्त-सङ्गः—संग से मुक्त; समाचर—भली-भाँति करो।

विष्णु के लिए यज्ञ रूप में किया गया कर्म ही करना चाहिए, अन्यथा कर्म मनुष्य को इस भौतिक जगत् में बाँध देता है। अतः हे कुन्तीपुत्र! उनकी प्रसन्नता के लिए अपने विहित कर्तव्यों का पालन करो, और इस प्रकार तुम सदा अनासक्त एवं बन्धन से मुक्त रहोगे।

चूँकि मनुष्य को शरीर के साधारण निर्वाह के लिए भी कर्म करना ही पड़ता है, इसलिए किसी विशिष्ट सामाजिक स्थिति एवं गुण के लिए विहित कर्तव्य इस प्रकार रचे गए हैं कि वह प्रयोजन पूर्ण हो सके। यज्ञ का अर्थ है भगवान् विष्णु अथवा यज्ञानुष्ठान। समस्त यज्ञानुष्ठान भी भगवान् विष्णु की प्रसन्नता हेतु ही हैं। वेद आदेश देते हैं: यज्ञो वै विष्णुः। दूसरे शब्दों में, चाहे मनुष्य विहित यज्ञ सम्पन्न करे अथवा भगवान् विष्णु की प्रत्यक्ष सेवा करे, वही प्रयोजन सिद्ध होता है। अतः कृष्णभावनामृत यज्ञ का ही अनुष्ठान है, जैसा कि इस श्लोक में विहित है। वर्णाश्रम संस्था भी भगवान् विष्णु की प्रसन्नता हेतु इसी का लक्ष्य रखती है। “वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्/विष्णुराराध्यते…” (विष्णु पुराण 3.8.8) अतः मनुष्य को विष्णु की प्रसन्नता के लिए कर्म करना है। इस भौतिक जगत् में किया गया कोई भी अन्य कर्म बन्धन का कारण होगा, क्योंकि शुभ तथा अशुभ दोनों ही कर्मों की प्रतिक्रियाएँ होती हैं, और कोई भी प्रतिक्रिया कर्ता को बाँध देती है। अतः मनुष्य को श्रीकृष्ण (अथवा विष्णु) को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनामृत में कर्म करना है; और ऐसे कर्म करते समय मनुष्य मुक्त अवस्था में रहता है। यही कर्म करने की महान् कला है, और आरम्भ में इस प्रक्रिया हेतु अत्यन्त निपुण मार्गदर्शन अपेक्षित है। अतः मनुष्य को भगवान् श्रीकृष्ण के किसी भक्त के निपुण मार्गदर्शन में, अथवा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष उपदेश के अधीन (जिनके अधीन कर्म करने का अवसर अर्जुन को प्राप्त हुआ), अत्यन्त परिश्रमपूर्वक कर्म करना चाहिए। कुछ भी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए, अपितु प्रत्येक कार्य श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए किया जाना चाहिए। यह अभ्यास मनुष्य को न केवल कर्म की प्रतिक्रिया से बचाएगा, अपितु क्रमशः उसे भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा तक भी उन्नत करेगा, जो अकेले ही मनुष्य को भगवद्धाम तक उठा सकती है।