हि

अध्याय 3 · 13 / 43

3.13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥

यज्ञ-शिष्ट—यज्ञ के अनुष्ठान के पश्चात् लिया गया भोजन; अशिनः—खाने वाले; सन्तः—भक्तगण; मुच्यन्ते—से मुक्ति पाते हैं; सर्व—समस्त प्रकार के; किल्बिषैः—पापों; भुञ्जते—भोग करते हैं; ते—वे; तु—किन्तु; अघम्—घोर पाप; पापाः—पापी; ये—जो; पचन्ति—भोजन बनाते हैं; आत्म-कारणात्—इन्द्रिय-भोग के लिए।

भगवान् के भक्तगण समस्त प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि वे वह भोजन ग्रहण करते हैं जो पहले यज्ञ के लिए अर्पित किया जाता है। अन्य, जो व्यक्तिगत इन्द्रिय-भोग के लिए भोजन बनाते हैं, वस्तुतः केवल पाप ही खाते हैं।

परमेश्वर के भक्तगण, अथवा वे व्यक्ति जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, सन्त कहलाते हैं, और वे सदा भगवान् के प्रेम में मग्न रहते हैं, जैसा कि ब्रह्म-संहिता में वर्णित है: प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति। सन्तगण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द (समस्त सुखों के दाता), अथवा मुकुन्द (मुक्ति के दाता), अथवा श्रीकृष्ण (सर्वाकर्षक पुरुष) के साथ सदा प्रेम के बन्धन में बँधे रहने के कारण, किसी भी वस्तु को पहले उस परम पुरुष को अर्पित किए बिना स्वीकार नहीं कर सकते। अतः ऐसे भक्तगण सदा भक्ति की विभिन्न विधियों में, जैसे श्रवणम्, कीर्तनम्, स्मरणम्, अर्चनम् आदि में, यज्ञ सम्पन्न करते हैं, और यज्ञों के ये अनुष्ठान उन्हें सदा भौतिक जगत् में पापमय संग के समस्त प्रकार के कल्मष से दूर रखते हैं। अन्य, जो स्व अथवा इन्द्रिय-तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, न केवल चोर हैं, अपितु समस्त प्रकार के पापों के भोक्ता भी हैं। यदि कोई चोर भी हो और पापी भी, तो वह सुखी कैसे रह सकता है? यह सम्भव नहीं। अतः लोगों को सब प्रकार से सुखी होने के लिए, उन्हें पूर्ण कृष्णभावनामृत में संकीर्तन-यज्ञ की सरल प्रक्रिया करना सिखाया जाना चाहिए। अन्यथा संसार में न शान्ति हो सकती है, न सुख।