हि

अध्याय 3 · 15 / 43

3.15

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

कर्म—कर्म; ब्रह्म—वेद; उद्भवम्—से उत्पन्न; विद्धि—जानना चाहिए; ब्रह्म—वेद; अक्षर—परब्रह्म (पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्); समुद्भवम्—प्रत्यक्ष रूप से प्रकट; तस्मात्—इसलिए; सर्व-गतम्—सर्वव्यापी; ब्रह्म—दिव्य तत्त्व; नित्यम्—नित्य रूप से; यज्ञे—यज्ञ में; प्रतिष्ठितम्—स्थित।

नियमित कर्म वेदों में विहित हैं, और वेद प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से प्रकट हुए हैं। फलस्वरूप सर्वव्यापी दिव्य तत्त्व नित्य रूप से यज्ञ-कर्मों में स्थित है।

यज्ञार्थ कर्म, अर्थात् केवल श्रीकृष्ण की प्रसन्नता हेतु कर्म की आवश्यकता, इस श्लोक में अधिक स्पष्ट रूप से कही गई है। यदि हमें यज्ञ-पुरुष विष्णु की प्रसन्नता के लिए कर्म करना है, तो हमें कर्म की दिशा ब्रह्म, अर्थात् दिव्य वेदों में खोजनी होगी। अतः वेद कर्म के निर्देशों के विधान हैं। वेदों के निर्देश के बिना किया गया कोई भी कार्य विकर्म, अर्थात् अनधिकृत या पापमय कर्म कहलाता है। अतः मनुष्य को कर्म की प्रतिक्रिया से बचने के लिए सदा वेदों से ही निर्देश ग्रहण करना चाहिए। जैसे साधारण जीवन में मनुष्य को राज्य के निर्देश के अनुसार कर्म करना पड़ता है, उसी प्रकार, मनुष्य को भगवान् के परम राज्य के निर्देश के अधीन कर्म करना पड़ता है। वेदों में ऐसे निर्देश प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के श्वास से प्रकट हुए हैं। कहा गया है: अस्य महतो भूतस्य नश्वसितमेतद्यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः। “चारों वेद—अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद—सब उस महान् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के श्वास से उत्पन्न हुए हैं।” भगवान्, सर्वशक्तिमान् होने के कारण, श्वास के द्वारा बोल सकते हैं, जैसा कि ब्रह्म-संहिता में पुष्ट होता है, क्योंकि भगवान् में अपनी प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा समस्त अन्य इन्द्रियों के कार्य करने की सर्वशक्तिमत्ता है। दूसरे शब्दों में, भगवान् अपने श्वास के द्वारा बोल सकते हैं, और वे अपने नेत्रों के द्वारा गर्भाधान कर सकते हैं। वस्तुतः कहा गया है कि उन्होंने भौतिक प्रकृति पर दृष्टिपात किया और इस प्रकार समस्त जीवों को उत्पन्न किया। बद्धजीवों को भौतिक प्रकृति के गर्भ में उत्पन्न अथवा आधान करने के पश्चात्, उन्होंने वैदिक प्रज्ञा में अपने निर्देश दिए कि ऐसे बद्धजीव किस प्रकार भगवद्धाम लौट सकते हैं—भगवान् के पास वापस जा सकते हैं। हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि भौतिक प्रकृति में स्थित बद्धजीव सब भौतिक भोग के लिए उत्सुक हैं। किन्तु वैदिक निर्देश इस प्रकार रचे गए हैं कि मनुष्य अपनी विकृत इच्छाओं को तृप्त कर सके, और तत्पश्चात् अपने तथाकथित भोग को समाप्त करके भगवान् के पास लौट सके। यह बद्धजीवों के लिए मुक्ति प्राप्त करने का अवसर है; अतः बद्धजीवों को कृष्णभावनाभावित होकर यज्ञ की प्रक्रिया का अनुसरण करने का प्रयत्न करना चाहिए। जो वैदिक विधानों का पालन नहीं कर सकते, वे भी कृष्णभावनामृत के सिद्धान्तों को अपना सकते हैं, और वही वैदिक यज्ञों अथवा कर्मों के अनुष्ठान का स्थान ले लेगा।