अध्याय 3 · 16 / 43
3.16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥
एवम्—इस प्रकार विहित; प्रवर्तितम्—वेदों द्वारा स्थापित; चक्रम्—चक्र; न—नहीं; अनुवर्तयति—अपनाता; इह—इस जीवन में; यः—जो; अघायुः—पापमय जीवन; इन्द्रिय-आरामः—इन्द्रियतृप्ति में संतुष्ट; मोघम्—व्यर्थ; पार्थ—हे पृथापुत्र (अर्जुन); सः—जो ऐसा करता है; जीवति—जीता है।
हे प्रिय अर्जुन, जो मनुष्य यज्ञ की इस विहित वैदिक पद्धति का पालन नहीं करता, वह निश्चय ही पापमय जीवन व्यतीत करता है, क्योंकि केवल इन्द्रियों में रमण करने वाला व्यक्ति व्यर्थ ही जीता है।
कठोर परिश्रम करो और इन्द्रियतृप्ति का भोग करो — इस धनलोलुप विचारधारा की भगवान् यहाँ निन्दा करते हैं। अतः जो इस भौतिक जगत् का भोग करना चाहते हैं, उनके लिए यज्ञ-सम्पादन का उपर्युक्त चक्र नितान्त आवश्यक है। जो ऐसे नियमों का पालन नहीं करता, वह अत्यन्त संकटपूर्ण जीवन जीता है और उत्तरोत्तर अधिकाधिक निन्दनीय होता जाता है। प्रकृति के नियमानुसार यह मनुष्य-जीवन विशेष रूप से आत्म-साक्षात्कार के लिए ही है — कर्मयोग, ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग, इन तीन मार्गों में से किसी एक के द्वारा। जो पाप-पुण्य से ऊपर उठे हुए दिव्यवादी हैं, उनके लिए विहित यज्ञों के सम्पादन का कठोरता से पालन आवश्यक नहीं है; किन्तु जो इन्द्रियतृप्ति में संलग्न हैं, उन्हें यज्ञ-सम्पादन के उपर्युक्त चक्र द्वारा शुद्धि की आवश्यकता है। विविध प्रकार के कर्म होते हैं। जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, वे निश्चय ही ऐन्द्रिय चेतना में संलग्न रहते हैं; इसलिए उन्हें पुण्यकर्म करने की आवश्यकता है। यज्ञ-प्रणाली इस प्रकार रची गई है कि ऐन्द्रिय चेतना वाले व्यक्ति इन्द्रियतृप्ति-परक कर्म की प्रतिक्रिया में फँसे बिना अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकें। जगत् की समृद्धि हमारे अपने प्रयत्नों पर नहीं, अपितु परमेश्वर की पृष्ठभूमि-व्यवस्था पर निर्भर है, जिसे देवता प्रत्यक्ष रूप से सम्पन्न करते हैं। अतएव ये यज्ञ प्रत्यक्षतः वेदों में वर्णित विशेष देवता के उद्देश्य से किए जाते हैं। परोक्ष रूप से यह कृष्णभावनामृत का ही अभ्यास है, क्योंकि जब कोई यज्ञ-सम्पादन में निपुण हो जाता है, तो वह निश्चय ही कृष्णभावनाभावित हो जाता है। किन्तु यदि यज्ञ करते हुए भी कोई कृष्णभावनाभावित नहीं होता, तो ऐसे सिद्धान्त केवल नैतिक नियम मात्र गिने जाते हैं। अतः मनुष्य को अपनी प्रगति केवल नैतिक नियमों तक सीमित नहीं रखनी चाहिए, अपितु कृष्णभावनामृत प्राप्त करने हेतु उनसे ऊपर उठ जाना चाहिए।